संसद में गतिरोध लगातार तीसरे हफ्ते जारी रहा और इसी के साथ मानसून सत्र आपने आखरी हफ्ते में प्रवेश कर गया। विपक्ष के तेवर को देखते हुए ये उम्मीद कम है कि सत्र के अंतिम दिनों में संसद चल पाएगी। इस हगामें का असर देश की आर्थीक गति पर पड़ेगा। इस सत्र करीब तीस विधेयक पारित होने हैं। जिनमें वस्तु एंव सेवा कर, भुमी अधिग्रहण, रीयल स्टेट और श्रम सुधार विधेयक आर्थिक विकास संवृद्धि को बढ़ाने के लिए महत्वपुर्ण हैं। दो अकों की विकास दर को पाने के लिए इन विधेयकों का पारित होना आवश्यक हैं। साथही देश के सामने आंतकवाद और आईएसआईएस के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए व्यापक चर्चा हो। इस के लिए आवश्क है कि संसद में चर्चा का आनुकूल माहौल बने। हमारे राजनैतिक दलों को ये कर्तव्य है कि वो अवरुद्ध चर्चा को बहाल करें। विपक्ष अगर से समझ रहा है कि उसका जिम्मेदारी केवल सत्ता दल के काम में अड़गा डा़लना है तो जनता ये समझ रही है कि देश के विकास में बाधा कौन पहुचा रहा हैँ। विपक्ष भी जनता का प्रतिनिधी है उसका जबावदेही जनता के प्रति हैं। न की राजनैतिक हित साधना। संसद का प्रतिदिन का खर्चा 6 करोड़ रुपए आता है जो देश की आवाम के खुन-पसीने की कमाई है। संसद में उठने वाले प्रश्नों से ही भविष्य की रणनीतिया तैयार होती है। अपने क्षेत्रों से चुनकर आए संसदों कि ये जिम्मेदारी है कि वो क्षेत्रों से जुड़े मुददों को संसद में उठायेगे और उनके जिंदगी को आसान बनाने में सहायक होगे।
रविवार, 9 अगस्त 2015
बुधवार, 22 जुलाई 2015
कैसे बनेगा समर्थ भारत
किसी देश के अर्थिक
विकास की गति को बढ़ाने में उस देश की जनसंख्या की भुमिका महत्वपूर्ण होती है। जिस
देश की जनता शिक्षित, प्रशिक्षित तथा तकनीकी ज्ञान से युक्त होगी वह देश उतनी ही
तेजी से विकास करेगा। चीन भारत से इसी दम पर आगे है। 1980 में चीन की साक्षरता दर जंहा
64 फीसद थी वह अब 95.5 प्रतिशत है। वहीं भारत की साक्षरता 74 फीसद। चीन कुल सकल
घरेलू उत्पाद का शिक्षा पर व्यय चार फीसदी है और स्वास्थ पर तीन प्रतिशत व्यय करता
है। भारत सरल घरेलू उत्पादन का शिक्षा पर व्यय चार फीसदी और स्वास्थ पर एक फीसदी
खर्च करता है। चीन ने 1981 से 2013 तक 68 करोड़ की गरीब जनता को उच्च आय की श्रेणी
में ला दिया। उसने अपनी जनता को रोजगारपरक बनाकर अपनी मानवपूंजी का उपभोग बड़ी
मात्रा में किया। आज वह
भारत की जीडीपी से पांच गुना ज्यादा है। यानी जंहा भारत का सकल घरेलू उत्पादन 2
ट्रिलियन है वही चीन का 9 ट्रिलियन ड़ॉलर है। चीन आज आर्थिक संवृद्धि तथा विकास
में भारत से कई आगे निकल चुका है। ये सब चीन ने अपनी मानवपूंजी को सशक्त कर हासिल
किया हैं। भारत जो युवाओं का देश है जिसकी 65 फिसदी आवादी नौजवान हो वह कैसे अपनी
आर्थिक व सामाजिक स्थितियों में बदलाव लाने में असमर्थ है? इसका
सबसे बड़ा कारण है घटिया किस्म की मानवपूंजी। विश्व आर्थिक फॉरम की 2015 में
जारी रिपोर्ट जो देशों की मानवपूंजी उपभोग पर आधारित है में भारत का 124 मुल्कों
में 100वां स्थान हैं। दिलचस्प तो यह है कि भारत अपने पड़ोसी मुल्क बग्लादेश, श्रीलंका
और भूटान से भी पीछे हैं। ब्रिक्स देश (रुस, चीन, ब्रजील और दक्षिण अफ्रीका) भारत
से आगे हैं। जिसका अर्थ है भारत अपनी मानवपूंजी का इस्तेमाल करने में पीछे हैं।
जिसका कारण है भारत आपनी जनता को शिक्षित,
कौशल विकास और स्वास्थ जैसी जनकल्याणकारी योजनाओं पर नाम मात्र का व्यय करता हैं। ग्यारवही
पंचवर्षिय योजना में शिक्षा और स्वास्थ पर कुल परियोजना व्यय का 10.9 प्रतिशत किया
गया। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि विकासशील देशों को अपने मानव संसाधनों पर 30
से 35 प्रतिशत निवेश करना चाहिए। विकसित राष्ट्रों में यह व्यय पर्याप्त मात्रा
में किया जाता है जिसका लाभ उन्हें मिलता हैं। यही कारण है कि कौशल निर्माण का
स्तर विकसित देशों का अपेक्षाकृत ऊंचा है। भारत जो विश्व की सातवीं बड़ी जीडीपी और
तीसरा क्रयशक्ति वाला मुल्क है उसे आपनी मानव पूंजी को सशक्त करने की तरफ पर्याप्त
ध्यान देना होगा तभी देश की आवाम गरीबी, भुखमरी, कुपोषण और बेरोजगारी से मुक्त हो
पाएगा।
शुक्रवार, 12 जून 2015
चीन की बौखलाहट
1914 में ब्रिटिश भारत के विदेश सचिव हेनरी मैकमोहन और तिब्बत के बिच हुए सीमा समझौते को चीन नही मानता। वह इस रेखा को अवैधानिक बतता है और अरुणचल प्रदेश और लदाख के अक्साई चिन को दक्षिण तिब्बत चीन का हिस्सा मानता है। तमाम विवादों और देश के बटवारे के साथ अंग्रेज ये जख्म भी हमें दे कर गए जो धीरे धीरे और बड़ा होता गया। वो चीन जो इससे पहले हमारा सबसे करीबी मित्र और सहयोगी हुआ करता था वो हमारा सबसे बडा शत्रू बन गया। 1950 के दशक में लगे हिंदी चीनी भाई भाई के नारे भी इस कड़वाहट को कम नही कर सके। 1962 के युद्ध और इसके बाद बनी परिस्थितीयों ने भारत चीन सम्बधों को और जटिल बना दिया। शीतयुद्ध के समय दोनों देशों के रिश्ते कमजोर ही बने रहे। फिर वक्त आया 1991 का जब मनमोहन और पीवी नरसिम्हा राव की जोड़ी ने आर्थिक सुधार के चलते उदारीकरण का रास्ता अ़़ख्ति़यार किया और अपनी देश की सीमा को विदेशी व्यापार के लिए खोल दिए। तब उम्मीद की गई कि व्यापार के रास्ते ही टूटे रिश्तों कि डोर फिर से जुड़ जाये। लेकिन इसके बाद तो ये देश सीमा विवाद के साथ अब आर्थिक प्रतिस्पर्धा के दंगल में उतर आया। महत्वकांक्षी चीन एशिया का सरताज बनना और विश्वशक्ति अमेरिका की जगह चाहता है। वहीं भारत बढ़ती आर्थिक शक्ति के रूप में आगे बढ़ रहा है और अपनी सैन्य शक्ति को भी बढ़ा रहा हैं। जिसे चीन अपने हितों के विपरीत देखता है। उसे लगता है कि भारत उसके प्रभाव को कम कर सकता है। वहीं युद्ध झेल चुके भारत को ये शंका बनी रहती है कि चीन अपनी विस्तारवादी नीति के चलते फिर हमला न कर दे। चीन के अड़ियल रुख के चलते टकराव के आसार बने रहते है। भारत और जपान सहित कई दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के साथ चीन के सम्बंध गर्माहट भरे है। मलेसिया, वियतनाम, फिलीपांइस,ताइवान, ब्रुनेई के साथ उसके समुद्री विवाद चरम सीमा पर हैं। चीन की बदलती तस्वीर यानी तेज गती से बड़ती आर्थिक और सैन्य शक्ति से चीन के तेबर गर्म है।इसलिए चीन द्वपाक्षीय वार्ता की जगह धमकी और धोस से अपनी बात मनवाना चाहता। लेकिन भारत भी 1991 के बाद बढ़ती आर्थिक और सैन्य क्षमताओं में लगातार वृद्धी कर रहा है। जो चीन की परेशनी का सबब बना हुआ है। इसलिए अब सीधे युद्ध न लाड़कर वह देश के पुर्वोत्तर राज्यों सहित पाकिस्तान में भारत के खिलाफ पल रहे अराजक तत्वों की सहयता करता है ताकि भारत के विकास में रूकावट डाली जा सके। चूकीं वो जनता है कि विकासशील भारत एशिया की उम्मीद बन रहा है। जो देश चीन से सीधे टक्कर नही ले सकते वो भारत को अपना हितैसी मानकर ये उम्मीद करते है कि विवादित मसलों को सुलझाने में वो उनकी मदद करेगा। जिसे चीन अपनी कूटनीतिक हार मानता है और भारत को आगे बढ़ने से रोकता है। वर्तमान में नई सरकार के आने के बाद विदेश नीति में आये परिवर्तन से भारत की स्थिती विश्व समुदाय में कितनी सशक्त हुई ये तो आने वाल वक्त ही बताएगा। लेकिन एक मजबुत सरकार के चलते उसकी निर्णय क्षमता और दुसरे मुल्कों से बेहतर होते रिश्तों ने चीन को ये सन्देश दे दिया है कि भारत अब किसी से कम नही है। वो अपने हितों की रक्षा करने में सक्षम हैं। लेकिन चीन इतनी जल्दी झुकने वाला नही है। वह किसी न किसी तरिके से भारत का उलझाये रखना चाहता हैं। इसीलिए वह सीमा विवाद को जल्द ख़त्म न करके केवल आदर्श संहिता के जरिये इस विवाद को जिन्दा रखना चाहता है ताकि भारत इस विवाद से अपना ध्यान न हटा सके और विकास में उसका पिछलग्गू बना रहे। पाकिस्तान से मिलकर वह जिस औध्योगिक गलियारे का निर्माण पाक अधिकृत जम्बू कश्मीर में कर रहा है वह इसी रणनीति का हिस्सा है। अब भारत ने चीन को उसी की भाषा में जबाब देने की रणनीति पर प्रमूखता से अमल किया है। पुर्वोत्तर नीति के तहत आरुणचल प्रदेश सहित सभी पुर्वोत्तर राज्यों के विकास कार्यो में तेजी लाई गई हैं। भारत को घेरने की रणनीति में शामिल चीन की बहूउद्देशिय सिल्क रोड़ योजना के जबाब में भारत ने हिंद सागरमाला पर काम कर रहा है। दूश्मन के दूश्मन से हाथ मिलाने की नीति में भारत ने जापन और अमेरीका जैसे देशों से अपने संबध मजबूत किए हैं। जिसके चलते उसके पेट में मरोड़ उठना स्वभाविक हैं।
बुधवार, 10 जून 2015
भूमंडलीकरण के निहितार्थ
भूमंडलीकरण के शाब्दिक अर्थ को सबजन सुखाय और बासुदेव कुटुंब्कम के साथ जोड़ा जाता हैं। इसको ऐसे परिभाषित किया जाता है मानो भूमंडलीकरण का सूत्रपात हर व्यक्ति को सहयोग और सुख देने के लिए हुआ हैं। पर वास्तविक स्तिथि इसके ठीक उलट हैं। एडम स्मिथ के विश्व व्यापार सिद्धांत से लेकर ब्रेटनवुड प्रणाली पर आधारित विश्व व्यापर पद्दति में कही भी सबजन हिताय सबजन सुखाय का जिक्र तक नही होता और न ही ऐसा देखने को मिलता है कि भूमंडलीकरण से किसी देश की आर्थिक सामाजिक स्थिति में बदलाब आया हो। वास्तव में ये भ्रम हमारे दिमाग में पैठा दिया गया कि दुनिया के विकाश के लिए भूमंडलीकरण का जन्म हुआ लेकिन सत्यता ठीक इसके उलट हैं। विश्व की वर्तमान स्थिति के अनुसार विश्व की 70 प्रतिशत आबादी अविकशित क्षेत्रों में निवास करती हैं। विश्व की 70 प्रतिशत लोग दो डॉलर से कम पर गुजरा कर रहे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार 2011 में निर्धनतम देश 1980 के मुकाबले ज्यादा गरीब हो गए। इन देशों का धन चुनिंदा पूजीपतिओं की जेबों में समा गया। आक्सेफैम (अंतरराष्ट्रीय एजेंसी) के रिपोर्ट अनुसार 8 वर्षो में विश्व की 51 प्रतिशत पूंजी 1 प्रतिशत लोगों के हाथो में पहुंच जाएगी जो 2009 में 48 प्रतिशत थी। इसका एक करण तो यह रहा कि पश्चिमी विकशित मॉडल की चाह में इन देशों ने विकशित देशों से कर्ज लिया और विकास के स्वर्णमृग का पीछा करते ये इस स्थिति तक आ गये कि अब बिना विदेशी पूँजी के अपने देश की अर्थव्यवस्ता तक नही चला सकते। भारत के यूपीए सरकार के बित्त मंत्री पि. चिदंबरम ने 2012 में संसद में बजट पेश करते हुए ये चिंता जाहिर की थी कि "भुगतान शेष में भरी कमी के चलते विदेशी मुद्रा की कमी के कारण विदेशी निवेश और विदेशी ऋण मज़बूरी बन चूका हैं।" दुसरी वजह यह है की भूमंडलीकरण मुद्रा प्रवाह में आने वाली रुकावटों को तो दूर करता हैं। पर मनुष्य को सरहदी दीवारों में बांध कर रखना चाहता हैं। लोगों को बाजार के जरीहे तो जोड़ना चाहता है सामाजिक स्तर पर नही। आधुनिक युग में 'दुनिया एक गांव है' तो वह एक खूबसूरत जगह हो सकती थी विषमताए तो गांव में भी होती हैं। लेकिन अपनापन भी होता हैं। लोग कहि भी आने जाने के लिए स्वतंत्र होते, हाल तक इतिहास में लोग अकाल पड़ने, अधिक अत्याचार या युद्ध की स्तिथि ने निपटने के लिए लोग पुराने इलाके छोड़कर नई जगहों पर बस जाते थे। ऐसी तरह लोक एक इलाके से दूसरे इलाको में आव्रजन करते थे। भारत में शक ,हुण और कुषाण और कई धुमंतू जातियां आई। यहुदी और पारसी भी इस्लाम के अत्याचार से बचने का लिए भारत आये। अमेरिका और भारत की खोज भी समृद्धि की खोज का हिस्सा थी। लेकिन जब यूरोपीय राष्ट्रों ने विश्व के समृद्धि भूखंडों पर कब्जा कर लिया तो जान समुदाओं के आव्रजन पर पाबंदी लगा दी। दिलचस्प तो यह है कि जब सस्ते श्रम की आवश्यकता होती है तो उनका ये दर्शन बदल जाता है। भूमंडलीकरण का मुख्य उद्देश्य लाभ अर्जित करना हैं। सस्ते श्रम का लाभ, प्राकतिक संसाधनों का दोहन कर उपभोग संस्कृती को बढ़वा देना। दृतीय विश्व युद्ध के बाद जो अर्थव्यवस्थाएं कड़ी हुई वो आज भी जीवंत हैं। पर इन 70 सालों में विश्व के शाक्तिशाली संगठन जी7 में कोई अन्य देश क्यों नही जुड़ पाया। जी8, जी9 या जी10 क्यों नही बन पाया? फिर भूमंडलीकरण के पैरोकार पश्चिमी देशों से कैसे अविकसित देशों में सुधार की उम्मीद की जा सकती है। सत्यता यही है कि भूमंडलीकरण के बाद इन देशों को आर्थिक शोषण तो हुआ ही साथही अविवाहित मातृत्व , नस्लवाद, नशे की लत, अधकचरा आधुनिकीकरण, और भ्रष्टाचार ने तीसरी दुनिया को अपने ग्रास में ले लिया और विश्व युद्धों की हिंसा में झोक दिया।
रविवार, 7 जून 2015
अंधकार में भविष्य के र्निमाता
बच्चे भविष्य के र्निमाता होते है लेकिन तब क्या हो जब इन कर्णधारों का भविष्य
ही अंधकार में हो? बड़ते भारत में लापता बच्चों की संख्या लाखो में है। पर सरकार से लेकर
प्रशासन तक बेपरवाह हैं। ग्रह मंत्रलाय के अनुसार 2014 में लापता बच्चों की संख्या
68000 के आस-पास है इनमे लडकियों की संख्या 63 फीसदी हैं। भारत में हर आठ मिनट में
एक बच्चा तस्करी का शिकार हो जाता है। पश्चिम बंगाल, महाराष्ट और दिल्ली राज्यों में
लापता बच्चों की संख्या सबसे अधिक है। मानवता के खिलाफ इस जघंतम अपराध की जड़े
गहराई तक जुड़ी हुई हैं। एशिया में भारत को मानव तस्करी का गढ़ माना जाता है।
तस्करी के शिकार इन बच्चों का यौन शोषण, मजदूरी और अंगों की तस्करी के रुप में
इस्तेमाल किया जाता हैं। बच्चों के प्रति अपराधो पर सर्वोच न्यायालय तक चिंता
जाहिर कर चुका हैं। 2013 में देश की सर्वोच्च न्यायालय ने 1.7 लाख गुम बच्चों की
संख्या और उसके प्रति सरकार कि बेरुखी के चलते प्रतिक्रिया दी थी कि ‘यह बिड़वना ही है कि किसी
को गायब होते बच्चों की फ्रिक ही नही है’ बच्चों के प्रति जवाहरलाल नहरु से लेकर
प्रधानमंत्री तक का प्रेम जगजाहिर है। नेहरु कि भाति मोदी भी बच्चों से संवाद करते
है अपने रेड़ियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ के जारिए उनसे जुड़ने की कोशिश करते है। लेकिन कुल आबादी
का 40 फीसद बच्चों की सुरक्षा और इतनी बड़ी संख्या में गायब हो रहे बच्चों को
ढुड़ना किसी की प्रथामिकता में नही हैं। जो ये दर्शाता है कि हमारे नैनिहाल जो इस
सभ्य और सक्षम भारत की नीवं बन सकते है वो आज किसी की प्रथामिकता में नही हैं।
सोमवार, 18 मई 2015
'यथा शिक्षा तथा विचार'
हमारे शब्दों में हमारे विचारों की अभिव्यक्ति होती हैं। चिंतन के गर्भ से उत्पन्न विचार हमारी मानसिकता को इंगित करते हैं। यघपि ये विचार हमारी शिक्षा तथा अनुभव की नींव पर जन्म लेते हैं 'यथा शिक्षा तथा विचार' यानी जैसी शिक्षा वैसे विचार। विचारों की महत्ता को रेखाकिंत करते हुए महर्षि अरविन्द ने कहा था कि "यदि भारत को अपना अस्तित्व बनाए रखना है और विश्व में अपना स्थान निर्धारित करना है तो हमारी पहली आवश्यकता होगी कि भारत का युवा विचार करना सीखे, सभी विषयों पर विचार करना स्वतंत्र रूप से ; लाभदायक ढंक से , वस्तुओं की तह तक जाकर पूर्ण निर्णयो से मुक्त होकर, एक तेज तलवार से मिध्याभ्यास और पूर्वाग्रह को काटते हुए, हर प्रकार की रूढ़िवादिता को मनो भीम की गादा के प्रहार सर चूर करते हुए....।" तघपि जब वर्तमान परिपेक्ष्य में शिक्षा आदर्श और यथार्थ से निकालकर प्रयोजनवादी हो जाए, जहां शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार सृजन करने तक सीमित हो जाता है, तब वैचारिक चिंतन का ह्रास होकर युवा प्रतिस्पर्धा के युग में प्रवेश करता हैं। जहां नैतिक मूल्यहीनता, सामाजिक विघटन, मानसिक तनाव जैसी कई विसंगतिओं का जन्म होता हैं। प्रतिस्पर्धा के आवेश में हम उचित अनुचित के बोध को समझने में असमर्थ हो जाते है और जन्म लेती है में और तुम की भावना। तब हम स्वयं को श्रेष्ठ समझते और दूसरों का तिरस्कार करते हैं। उसकी कमियों को खोजते है और खुश होते हैं। इन सब के बीच शिक्षा का मूल्य उद्देश्य मानवीय एकता , दयाभाव , सेवा, शिष्टता, आत्मिक उन्नति, संस्कृति और सभ्यता के प्रति लगाव जैसे पहलु काफी पीछे छूट जाते हैं। और सच होती है लार्ड मैकाले की 1832 में की गई भविष्यवाणी जो उसने ब्रटिश संसद में की थी कि भारत की आने वाली पीढ़ी शारीर से तो भारतीय होगी पर मानसिक रुप से अंग्रेजी होगी। उसी की बनाई शिक्षा निति का अनुसरण हम आजादी के बाद भी सिद्दत से करते आ रहे हैं। रही कसर शिक्षा का निजीकरण और बाजारीकरण कर भारतीय निति निर्माताओं ने पूरी कर दी। सरकारी और प्राइवेट स्कूलों के भीच की खाई इतनी बढ़ती जा रही है कि आने वाली पीढ़ी के मन में एक दुसरे के प्रति वैमनस्यता के साथ साथ सामाजिक स्तरीकरण भी बढता जा रहा हैं। आज बढ़ते अपराधों का कारण भी हमारी शिक्षा ही हैं। वर्तमान शिक्षा प्रणाली कोई मनुष्यत गुण उतपन्न नही करती। तत्व रहित शिक्षा जिसे स्वामी विवेकानंद 'निषेधात्मक शिक्षा' कहते हैं। एक अभावात्मक शिक्षा जो व्यक्ति की मौलिकता को कुण्ठित कर देती हैं। इसलिए शिक्षा ऐसी हो जो आज की पीढ़ी के पुरुषार्थ को सबल बनाये, उनके चरित्र और बुद्धि का विकास करें। युवा अपने लक्ष्य को पाने में समर्थ बन सके। तभी हम अपने देश को परम वैभव अर्थात सर्वांगीण उन्नति के पथ पर आधारित, विश्वमानवता के कल्याण के लिए भौतिक और अध्यत्मिक उन्नति को सुनिश्चित कर सकेगे।
सार्थक पहल
41 साल पहले इंदिरा और बांग्लादेश के मजीबुर्रहमान के बीच हुये सीमा समझौते को अमलीजामा पहनाकर भारतीय राजनीति ने ये साबित कर दिया की वो राष्ट्र से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दो पर आम राय रखते है जो अमूमन नजर नही आती। साथही भारत हर विवादास्पद मुद्दों का वार्तालाप और आपसी समझौते के जरिये सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध है। बाग्लादेश और भारत के भीच हुए इस समझौते की तरह क्या भारत पाकिस्तान सीमा विवाद का रास्ता खोजा जा सकता है? अगर ये मुमकिन हो जाता है तो इतिहास के पन्नों में ये सदी स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज की जायेगी।सीमा विवाद के खत्म होते ही पूरा दक्षिण एशिया में शांति और सामरिक सहयोग से सबसे समृद्धशाली और शक्तिशाली बनकर उभर सकता हैं। भारत -पाक के हुक्मरानों को जल्द से जल्द इस विवाद को खत्म करने की पहल पर आगे बढ़ना चाहिए तभी हम अपनी आवामों को 21 वी सदी की जरूरतों के अनुरूप तैयार कर उन्हें उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने में समर्थवान बना सकते हैं।
शांति और दोस्ती के बल पर ही भारत और पाकिस्तान अपनी वैश्विक पहचान बना सकते है तथा तीव्र आर्थिक और सामाजिक विकाश के लक्ष्य को पाने में कामयाब हो सकते हैं। क्या हम हिन्द-पाक के बेहतर आवामी रिश्तों की संभावना को बांग्ला समझौते में तलाश सकते हैं। आज के दौर में ये संभव हो सकता हैं। राजनैतिक क्षमता और पूर्वाग्रह को दरकिनार कर हम ऐसा कर सकते हैं। सरहदी जमीनों पर अमन कायम हो सकता हैं आखिर हम सब इसके हक़दार भी हैं। बस आवश्यकता है तो केवल एक सार्थक पहल की।
शांति और दोस्ती के बल पर ही भारत और पाकिस्तान अपनी वैश्विक पहचान बना सकते है तथा तीव्र आर्थिक और सामाजिक विकाश के लक्ष्य को पाने में कामयाब हो सकते हैं। क्या हम हिन्द-पाक के बेहतर आवामी रिश्तों की संभावना को बांग्ला समझौते में तलाश सकते हैं। आज के दौर में ये संभव हो सकता हैं। राजनैतिक क्षमता और पूर्वाग्रह को दरकिनार कर हम ऐसा कर सकते हैं। सरहदी जमीनों पर अमन कायम हो सकता हैं आखिर हम सब इसके हक़दार भी हैं। बस आवश्यकता है तो केवल एक सार्थक पहल की।
गुरुवार, 14 मई 2015
राहुल से उम्मीद
2004 में भारतीय राजनीति में जब राहुल गांधी का प्रवेश हुआ, तो चर्चाओ के बाजार में इन्हें भविष्य का नेता माना जा रहा था। बड़े जोशोखरोश के साथ इनका स्वागत हुआ। खबरिया चैनलों में राहुल की हर हरकत पर तीखी नजर रहती थी। गांव में रात बिताने, मच्छर के काटने और गरीब के घर रोटी खाने तक की खबरों को मीडिया में प्रमुखता से कवर किया जा रहा था। अपनी लोगप्रियता की चरमसीमा पर थे राहुल। जिसे 2009 के लोकसभा चुनाव की जीत ने साबित भी कर दिया की वास्तव में वो आने वाले समय के बड़े नेता हैं। लेकिन धीरे धीरे ये तिलिस्म मद होता गया। लेकिन 2014 की हार के बाद एक बार फिर राहुल की आक्रमकता लोट आई सी लगती हैं। संसद से लेकर सड़क तक वो सरकार को घेरते नजर आ रहे हैं। उनके बयानों पर राजनैतिक गलियारों में गर्माहट आ गई है जो कुछ दिनों से नदारद थी। राहुल का कायाकल्प भी ठीक समय पर हुआ जब पार्टी को उनकी बेहद जरुरत हैं। कॉग्रेस अपनी खोई जमीन को पाने के लिए राहुल की सक्रियता पर ही निर्भर करती हैं। कॉग्रेस के लिए राहुल ही वो एकलौते चहेरा हैं जिसके बल पर वो मुख्य धारा मे अपनी वापसी की उम्मीद कर सकती हैं। मैजूदा राजनितिक हालातो के चलते ने उन्हें ये मौका भी मिल गया जिसे उन्होंने बिना देरी किये भुना लिया। राहुल किसी भी मुद्दे पर मोदी सरकार को घेरने का मौका नही छोड़ते। सूट - बूट पर दिए बयान से लेकर वो लगातार सरकार पर कॉर्पोरेट परस्ती का आरोप लगा रहे है जिनमें उनकी आक्रमकता झलक रही हैं। सड़क से लेकर संसद तक भूमि अधिग्रहण बिल के जरीये वो कॉग्रेस को किसानहितैषी और सरकार को किसानबिरोधी बता रहे हैं। रेल में सफर कर आम आदमी से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं। इन सब में राहुल कितने कामयाब होते है ये तो आने वाल वक्त ही बताएगा। पर राहुल ने अलग थलग पड़े विपक्ष और कॉग्रेस मुर्दे में नई जान जरूर डाल दी हैं।
सोमवार, 20 अप्रैल 2015
कैसा विकास
आजादी के बाद भारतीय समाज में राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से कई महत्वपूर्ण बदलाबों का दौर चला जो अनवरत जारी हैं। पर ये बदलाब किन मूल्यों पर आधारित हैं? आजादी के पहले समाज ने दुसरो की गुलामी को नकारते हुये उन्हौंने समाज की स्वतंत्रता के लिए एक साथ एक मंच पर अपनी जिन्दगी की कुर्वानी देकर हमें सिखाया की जब तक समाज का हर वर्ग संतुष्ट नही होगा परिवर्तन का दौर चलता रहेगा। पर क्या आज ये कल्पना की जा सकती है की होने वाला परिवर्तन समाज के हर वर्ग या व्यक्ति के लिए हितकर होगा। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और महात्मा ग़ांधी जैसे देशभक्तों ने क्या ऐसे ही भारत का सपना देखा था। जहां देश की आधी आबादी को दो जून की रोटी तक नसीब नही होगी। कर्ज के तले दबे किसानों को आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना होगा और हमारे हुक्मरान उनकी जमीनो को छीनकर उन्हें विकास की परिभाषा बताएंगे। सांप्रदायिकता की बढ़ती आग, भ्रष्टाचार की बढ़ती लौ और शहीदों की चिताओं से उठता धुआँ आखिरकार क्या यही उन्नत समाज की कल्पना की थी। पृथ्वी से चाँद और मंगल की दुरी तो हमने नाप ली पर गरीब की थाली तक हम नही पहुंच पायें। आखिर क्या कारण है इन सबका जो हमें पूछने को मजबूर करती है कि कैसा विकास किसकी तरक्की। देश की कुल सम्पति का 90 प्रतिशत हिस्सा, 10 प्रतिशत आबादी के हाथों में हैं।
एक तरफ वो आबादी हैं जो मूलभूत जीवन की सुविधाओं- घर, भूख, बीमारी और अज्ञानता से स्वतंत्रता चाहते हैं। एक तरफ ये आबादी है जिसके पास फाइफ स्टार सुविधायुक्त वहुमंजिला आलीशान बगलें से लेकर मार्स्टीज और बी. एम. डब्लू कारें हैं। कुछ के पास तो स्वयं के उठनखटोले भी हैं। उच्च तकनीकीयुक्त अस्पताल हैं। इन सब के बावजूद इन महत्वाकांक्षी लोगों में अश्लील किस्म का लालच हैं। वे हर चीज को हासिल करना चाहते हैं। वो भी जिसके वो हक़दार नही हैं। समाज के हिस्से के संसाधनों पर इनकी गिद्ध नजर बनी रहती हैं। उन पर कब्ज़ा और लूट करने में भी ये नही हिचकिचातें। इस नवउपनिवेश के दौर में आम आदमी केवल छदम स्वतंत्रता में जी रहा हैं। इन सब के बीच महात्मा ग़ांधी का हरेक बच्चे की आँखों से आंसू पोंछने का सपना क्या सपना ही रह जाएगा? इस सपनें को पूरा करने का उत्तरदायित्व हम सब हैं। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए हर मेहनतकश, निष्कपट और ईमानदार नागरिकों को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। इस लक्ष्य को पाना ही इन महापुरुषों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजली होगी।
एक तरफ वो आबादी हैं जो मूलभूत जीवन की सुविधाओं- घर, भूख, बीमारी और अज्ञानता से स्वतंत्रता चाहते हैं। एक तरफ ये आबादी है जिसके पास फाइफ स्टार सुविधायुक्त वहुमंजिला आलीशान बगलें से लेकर मार्स्टीज और बी. एम. डब्लू कारें हैं। कुछ के पास तो स्वयं के उठनखटोले भी हैं। उच्च तकनीकीयुक्त अस्पताल हैं। इन सब के बावजूद इन महत्वाकांक्षी लोगों में अश्लील किस्म का लालच हैं। वे हर चीज को हासिल करना चाहते हैं। वो भी जिसके वो हक़दार नही हैं। समाज के हिस्से के संसाधनों पर इनकी गिद्ध नजर बनी रहती हैं। उन पर कब्ज़ा और लूट करने में भी ये नही हिचकिचातें। इस नवउपनिवेश के दौर में आम आदमी केवल छदम स्वतंत्रता में जी रहा हैं। इन सब के बीच महात्मा ग़ांधी का हरेक बच्चे की आँखों से आंसू पोंछने का सपना क्या सपना ही रह जाएगा? इस सपनें को पूरा करने का उत्तरदायित्व हम सब हैं। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए हर मेहनतकश, निष्कपट और ईमानदार नागरिकों को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। इस लक्ष्य को पाना ही इन महापुरुषों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजली होगी।
शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015
सेक्युलर कि परिभाषा
हमारे देश के वैचारिक और बुद्धजीवी वर्ग खासकर वो वर्ग जो अपने स्वयं को मानवतावादी और सेक्युलर कहलाना पसंद करते हैं। तथाकथित ये सेक्युलरवादी केवल मुस्लिम हितों को ही सेक्युलरिज्म मानते हैं। फिर चाहें वो भारत के हो या अन्य किसी देश कें। इनकी एक और प्रवृति है की मुसलमानों के साथ बुरा किसी भी मुल्क में हो इनका विरोध येन केन प्रकरेण संघ और बीजेपी को दोष दिए बिना पूरा नही होता। इनके मानवतावाद में केबल मुस्लिम हित ही शामिल है। आपत्ति मुसलमानों की लिए आवाज उठाने से नही बल्कि केवल मुस्लिम को ही क्यों मानवता और सेक्युलर के दायरे आते हैं। विश्व में अन्य धर्मों की हालत भी निराशाजनक हैं। पादरी और यहुदी समुदाय की जनसंख्या लगातार घटती जा रही हैं। पादरी समुदाय की जनसंख्या 60 हजार है जो बीते सालों से लगातार कम होती जा रही है. यहूदीयों की जनसँख्या केवल 5 हजार हैं। पाकिस्तान और बंगलादेश में आज हिन्दुओं की क्या दुर्दशा है उसकी और भी ध्यान दिया जाना चाहिए या नही। पाकिस्तान में हुई 1951 की जनगणना में हिन्दु और सिखों की जनसंख्या का प्रतिशत कुल जनसख्या का 4 प्रतिशत था। लेकिन 1991 में हुए जनगणना में इनका प्रतिशत 1 कैसे रह गया। बाकि 3 प्रतिशत लोग कहा चले गये। हिन्दु मंदिरों को तोड़ा जा रहा हैं। उन्हें अपने धार्मिक रीती रिवाजों को करने से रोका जाता हैं। क्या हमारे सेक्युलर भाई इनके लिए भी चिंता जाहिर करेंगे।
गाजा में हो रहे इजराइल हमले की निंदा हर कोई कर रहा हैं। पर एक प्रसिद्ध हिंदी अखबार के लिखा जाता है कि इस हमले में ज्यादा खुसी संघ और बीजेपी को हो रही हैं। लेखक के अनुसार "दुनिया में जहां कही भी मुसलमानों को नुकसान पहुंचे ,आरएसएस भले ही मिठाइयां न बाटे, पर इनके नेताओं के चहरे खिल जाते हैं।"और आगे लिखते है कि "इसी वजह से केंद्र सरकार ने गाजा पर कोई प्रस्ताव लाने से इंकार कर दिया। ऐसा कभी नही हुआ कि भाजपा या उसके किसी संगठन ने इजराइल दूतावास पर हुए विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया हो।" इस तर्क से ये सिद्ध होता है कि सेक्युलर की नीति चीखने और चिल्लाने की रही हैं। वो ये भूल जाते है कि इजराइल के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र संघ में द्वारा मानवाधिकार उलंघन प्रस्ताव के पक्ष में भारत ने वोट भाजपा की सरकार ने ही दिया था। जो दर्शाता है कि वो इन हमलों की भर्त्सना करते हैं। लेकिन जिन्हें केवल किसी भी प्रकार से जो गंगा, गाय, गीता और हिंदु की रक्षा की बात करें या उनसे जुड़े मुद्दों को उठायें वह इनकी नजर में न केवल मुस्लिमविरोधी बल्कि साम्प्रदायिक हैं। इनका वश चले तो यह जम्मू कश्मीर में आई बाढ़ के पीछे भी भाजपा और संघ का नाम लेने लगें। पर अफ़सोस की ये कहना उनके वश में नही।
गाजा में हो रहे इजराइल हमले की निंदा हर कोई कर रहा हैं। पर एक प्रसिद्ध हिंदी अखबार के लिखा जाता है कि इस हमले में ज्यादा खुसी संघ और बीजेपी को हो रही हैं। लेखक के अनुसार "दुनिया में जहां कही भी मुसलमानों को नुकसान पहुंचे ,आरएसएस भले ही मिठाइयां न बाटे, पर इनके नेताओं के चहरे खिल जाते हैं।"और आगे लिखते है कि "इसी वजह से केंद्र सरकार ने गाजा पर कोई प्रस्ताव लाने से इंकार कर दिया। ऐसा कभी नही हुआ कि भाजपा या उसके किसी संगठन ने इजराइल दूतावास पर हुए विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया हो।" इस तर्क से ये सिद्ध होता है कि सेक्युलर की नीति चीखने और चिल्लाने की रही हैं। वो ये भूल जाते है कि इजराइल के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र संघ में द्वारा मानवाधिकार उलंघन प्रस्ताव के पक्ष में भारत ने वोट भाजपा की सरकार ने ही दिया था। जो दर्शाता है कि वो इन हमलों की भर्त्सना करते हैं। लेकिन जिन्हें केवल किसी भी प्रकार से जो गंगा, गाय, गीता और हिंदु की रक्षा की बात करें या उनसे जुड़े मुद्दों को उठायें वह इनकी नजर में न केवल मुस्लिमविरोधी बल्कि साम्प्रदायिक हैं। इनका वश चले तो यह जम्मू कश्मीर में आई बाढ़ के पीछे भी भाजपा और संघ का नाम लेने लगें। पर अफ़सोस की ये कहना उनके वश में नही।
बुधवार, 15 अप्रैल 2015
तर्क की तराजू
भगवान बुद्ध ने कहा था कि किसी बात पर इसलिए विश्वास मत करो कि वह मेरे गुरु ने या ग्रंथ ऐसा कहते हैं। हर शब्द को तर्कों पर तोलो और अपनी बुद्धिमता से सही और गलत का निर्णय करो। पर अक्सर इन ज्ञानपुरुषों के दिए दिव्यज्ञान को छोड़कर हम उनकी प्रतिमाओं के आगे नतमस्तक हो जाते हैं। अपने हितों को सर्वोपति रखकर उनके नाम पर दूसरों को उपदेश देते रहते हैं। हम भारतीयों की सबसे बड़ी समस्या ही यही है कि हम तर्कों के स्थान पर भावनात्मक हो जाते है और भावनात्मक होने के स्थान पर तर्कवादी, और आपसी सौहार्द भुलाकर विभिन्न विचारधाराओं के नाम पर आपस में कटुता और वैमनस्य की भावना को जन्म देते हैं। ये जानते हुए भी की हर विचारधाराओं का चाहे वो दक्षिणपंथी हो वामपंथी हो , या कोई धर्म सब ने मानव समुदाय के हितों को ही सर्वोपरि रखा। ये भी सही है की हर विचारधारा में कुछ खामिया होती है जो उस वक्त की स्थिति परिस्थतियों पर निर्भर करती हैं। मौजूदा व्यवस्था का प्रभाव उन पर रहता हैं। लेकिन हम उनको तथ्यों और तर्कों की कसौटी पर कसने की वजाह उनका अंधानुकरण करने लगते है तो वो न तो मानवहित मे होता है न समाज हित में।
सोमवार, 13 अप्रैल 2015
वैचारिक उग्रवाद का दौर
वैचारिक उग्रवाद के दौर से गुजर रहे इस मुल्क को अपनी सांस्कृतिक सामरिक पहचान बनाये रखने के लिए समाज के वुद्धिजीविओं और समाजशास्त्रीओं को ही आगे आना होगा। शासन का काम नियम ,कानून और सुरक्षा व्यवस्था कायम करना होता है। समाज उचित दिशा और दशा तय करे इसके लिए आजकी पीढ़ी को उचित मार्गदर्शन की नितांत आवयश्कता है। लोकनीति, नैतिकता ,लोक व्यवहार, पारिवारिक और सामाजिक नियमों को अपनी स्वतंत्रता में खनन मानती ये पीढ़ी और अपनी निरंतर बढ़ती भोगवादी इच्छाओ को प्राप्त करना, सभ्यता और संस्कृति को गाली देना, अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करने देना इनकी आज़ादी की पहली शर्त है, यदि इसमे किसी खनन डाला तो वो इनके अधिकारों का हनन हैं। इन विचारों से प्रभावित होने पर अनुशासन, जबाबदेही, देशप्रेम और आत्मिक उन्नति जैसी अवधारणो को समझने मे असमर्थ होती युवा आबादी का बड़ा हिस्सा जिस के बल पर हम दुनिया के सामने सीना तान रहे है, अगर इन्हें सही मार्गदर्शन नही मिला तो भविष्य में इसके परिणाम घातक हो सकते है। धार्मिक उग्रवाद हो या वैचारिक उग्रवाद दोनों ही समाज के लिए पतन का कारण होते हैं। इसलिए विरोधी स्वर को सुधारात्मक स्वर में बदले बिना देश मुख्य समस्याओं जैसे गरीबी, सामाजिक विघटन, साम्प्रदायिकता जैसी विकराल समस्याओं का समाधान नही कर पायेगे। मैजूदा हालातो में बढ़ती युबा आवादी को प्रतिभावान और वैचारिक सशक्तिकरण करना अतिआवश्यक हैं। स्वामी विवेकानंद ने कहा था "हम बालू पर राष्ट्र निर्माण नही कर सकते, उसके लिए एक ठोस आधार एक चट्टानी नीव चाहिए और वह केवल चरित्र निर्माण के द्वारा ही हासिल किया जा सकता हैं।"
शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015
राष्ट्रवाद के निहितार्थ
कभी कभी परिस्थितियां यह सोचने पर विवश कर देती है कि भारत का राष्ट्रवाद क्या इतना कमजोर है कि चंद लोगों द्वारा लगाये गये देश विरोधी नारों से राष्ट्र बिखर जायेगा. हमारी हजारों सालों की सांस्कृतिक विरासत जो हमें अलग-अलग भाषा, अलग रहन-सहन, जातीय भिन्नताओं के बावजूद हमें एकता के सूत्र में बाधे रही हो, वह चंद सिरफिरों की वजह से विखर जाएगी? विविधिता में एकता के सिद्धांत ने भारत को अदभुत राष्ट्र के रूप में दुनिया में स्थापित किया है, साथ ही समाजशास्त्रियो के द्वारा दी गई राष्ट्र की परिभाषा को भारत ने ही गलत साबित किया है. जो एक समूह के साझा इतिहास, एक भाषा, एक धर्म, एक जातीय और समाज के सामान्य उद्देश्य को राष्ट्र की परिभाषा बताते रहे थे. अर्नेस्ट बार्कर के अनुसार "राष्ट्र ऐसे मनुष्यों का एक समुदाय है. जो एक निश्चित प्रदेश में रहते है, जो सामान्य रूप से विभिन्न जातिओं से मिलकर बने होते है. सामान्य विचार और आदर्शो की एकता पाई जाती है. उनका धर्म लगभग एक ही प्रकार का होता है. वे अपने भावो, विचारों को व्यक्त करने के लिए एक ही भाषा का इस्तेमाल करते है. सामान्य इच्छा और भावना होती है." इसी परिभाषा के आधार पर जॉन स्ट्रेची ने तो भारत को एक राष्ट्र मानने से ही इंकार कर दिया था. उसने तो यहा तक कह दिया था कि "अतीत में भारत राष्ट्र नाम की कोई चीज ही नही थी और न ही आगे होने की संभावना है." के निहितार्थ
भारत जहां लगभग दुनिया के हर धर्म के अनुयायी यहूदी, पारदी. इसाई, मुस्लिम, जैन, बोद्ध और हिन्दू, हजारों बर्षो से साथ रहते आ रहे हैं. भारत का स्वरूप न केवल भौगोलिक विविधिता से भरा हुआ है बल्कि सांस्कृतिक और भाषाई भी रूप से भी बाहुलता को सजोये हुए है. भारतियों ने न केवल आपसी समन्वय के साथ राष्ट्रियता का परिचय दिया बल्कि क्षेत्र, भाषा. धर्म की विभिन्नताओं में एकता का सिद्धांत प्रतिपादित किया. इससे इतर इतिहास के विद्धवान राष्ट्रावाद को केवल परिस्थितिओं की उपज मानते है जो यूरोप में रोम साम्राज्य के पतन के साथ चर्च-राज्य संघर्ष से उपजी राजव्यवस्था है.
यूरोप की तात्कालिक विकेन्द्रीकृत सत्ता को संगठित करने के लिए सर्वसत्ताधारी सम्प्रभुता और केंद्रीकृत राज्य की स्थापना हुई. अट्ठारहवीं सदी में जब सामंतवाद चारों तरफ़ पतनोन्मुख हुआ और युरोप औद्योगिक क्रांति के दौर से गुज़र रहा था, तब पूँजीपति वर्ग राष्ट्रवाद की विचारधारा के तले एकताबद्ध हुए। उन्होंने ख़ुद को एक समरूप और घनिष्ठ एकता में बँधे राजनीतिक समुदाय के प्रतिनिधियों के तौर पर देखा। अधिक सुख की चाह, निजी सम्पति के मालिक बानने की इच्छा ने उन्हें मौजूं गरीबी धार्मिक रूढीवादी विचारों से और राजा के आत्याचार से मुक्ति पाने के लिए जगह-जगह विद्रोह होने लगे और स्थानीय विद्रोह का लाभ उठा कर पूँजीपति वर्ग राजशाही के ख़िलाफ़ सम्पूर्ण राष्ट्रवादी आंदोलन की शुरुआत की. जिसके फलस्वरूप नये संप्रभुता सम्पन्न, निजी अधिकारों और केन्द्रीय शासनव्यव्स्था से लैस राष्ट्र-राज्यों की स्थापना हुई. फ्रांस की क्रांति और ब्रिटेन में सविधानिक सुधारों के साथ धीरे- धीरे आगे पुरे यूरोप में फैल गई.
18 वी और 19 वी सदी पश्चमी राष्ट्रवाद की जननी रही, तो वहीं 20 वी सदी का आरम्भ राष्ट्रवाद का विकृत रूप लेकर आया. जिसने जोसेफ़ स्टालिन, एडोल्फ हिटलर और मार्शल टिटो जैसे तानाशाह को पैदा किया. प्रथम विश्वयुद्ध और द्वतीय विश्वयुद्ध में राष्ट्रवाद ने ही सुलगती आग में घी डाला और लाखों लोगों के खून से अपनी प्यास बुझाई. जर्मनी में हिटलर ने राष्ट्रवाद के नाम पर ही 60 लाख यहुदिओं को जलती आग की भट्टी में झोंक दिया था. भारतीय उपमहाद्वीप के बिखराव का कारण यही विकृत राष्ट्रवाद ही था. जिसके प्रभाव में जिन्ना ने टू नेंशन थियोरी के आधार पर भारत की छाती को चीरकर पाकिस्तान की नीव डाली. आज तक उस छाती का घाव नही भर पाया है. इसी आग में मध्य एशिया एक दशक से भी ज्यादा समय से उबल रहा है. फिलिस्तीन और इजरायल के बीच छिड़ी जंग ने न जाने कितने मासूमों की जान ली. अब तक दोनों देशों के बीच पांच युद्ध होने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है. यूरोप में जिन परीस्थियों में राष्ट्रवाद ने जन्म लिया वैसी स्थिति भारत सहित एशिया के कई देशों में नही थी.
यूरोपीय लोगों की अलग संस्कृति और सभ्यता है. अलग विचार और अलग जीवनशैली है. जिसका प्रभाव उनकी शासनव्यवस्था में समाहित हुआ लेकिन ठीक उसी विचार या व्यवस्था को जब पृथक विचारो, रहन-सहन और भिन्न संस्कृति-सभ्यता के लोंगो ने अपनाया जिसका परिणाम आज भी ये देश भूगत रहे है. यूरोप में जिन परीस्थियों में राष्ट्रवाद ने जन्म लिया वैसी स्थिति भारत सहित एशिया के कई देशों में नही थी. इस के ठीक उलट भारत के प्राचीन इतिहास से लेकर आज तक कभी भी शासनव्यवस्था हमारे राष्ट्रवाद की धुरी नही रही है. भारत में संस्कारिक और धार्मिकता से होकर मानव प्रेम और वसुधैव कुटुंबकम को राष्ट्र का ध्येय माना जाता रहा है. हमें अपनी मातृभूमि माता तुल्य पूजनीय और स्वर्ग से भी प्रिय है. हजारों साल पहले रचित वेदों में भूमि को 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी' की उपमा दी गई है. श्री कृष्ण द्वारा भारतवर्ष की स्थपना हो. या आचार्य चाणक्य की कूटनीति से सिकंदर से मिली जीत. उन्ही के द्वारा स्थापित किया गया अखण्ड भारत जिसे चन्द्रगुप्त मौर्या और सम्राट अशोक ने आदर्श भारत बनाया. मध्य काल में गुप्त साम्राज्य (श्री गुप्त, समुद्र गुप्त, विक्रमादित्य) ने भारतीय साम्राज्य का परचम पुरे भारतीय उपमहाद्वीप में फहराया. कितने ही विदेशी आक्रमणों से जूझते हुए भारत एक अखण्ड भारत ही बना रहा. भोगौलिक असमानता, भाषाई भेद के बावजूद भारत पर जब जब मुश्वित आई समस्त भारतियों ने मिलकर उसका सामना किया.
कितनी ही विदेशी जातिया भारत आई पर सब भारतीय हो गई. यही है असली राष्ट्रवाद जो हमेशा समस्याओं के दौरान भारतीय विभिन्नता को राष्ट्रीय एकता की भावना में परिवर्तित कर देता है. राष्ट्रीयता की भावना ही नागरिकों को राष्ट्र के प्रति समर्पण और समाज के उत्थान के प्रति निरंतर प्रयासरत रहने के लिए प्रेरित करती है. इसी भावना ने आधुनिक भारत के समाज सुधारक राजा राममोहन राय, ईश्वर चन्द विद्यासागर, दादा भाई नौराजी, गोपाल क्रष्ण गोखले और महात्मा गाँधी जैसे राष्टीय चरित्र निर्माणकरीओं ने राष्ट्र पर आई विपत्तियों और झुकते भारत को पुनः राष्ट्रीय गौरव प्रदान किया. भारत वसुधैव कुटुम्बकम्’ की उदार भावना को लेकर चला है। आज हमारा जो भी अस्तित्व सुरक्षित है, जितनी भी हमारी निधि है, यह सब हमारे उच्च व्यवहार और सदाचार का ही परिणाम है। राष्ट्र में समस्या आती है विपदाएं घेरती है लेकिन राष्ट्र की चेतना व्यक्ति के माध्यम से आपने हर मुश्किल हालातों का सामना करता है और निरंतरता बनाये रखता है. राष्ट्र का स्वाभिमान बनाये रखना और राष्ट्रीय भावना को एकता के सूत्र में पिरोये रखकर चुनौतिओं का सामना करना हमें हमारे इतिहास ने सिखाया है. कितने ही विदेशी आक्रमण हुए क्रूर शासक आये और चले गए पर भारत था, है, और रहेगा।
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