कभी कभी परिस्थितियां यह सोचने पर विवश कर देती है कि भारत का राष्ट्रवाद क्या इतना कमजोर है कि चंद लोगों द्वारा लगाये गये देश विरोधी नारों से राष्ट्र बिखर जायेगा. हमारी हजारों सालों की सांस्कृतिक विरासत जो हमें अलग-अलग भाषा, अलग रहन-सहन, जातीय भिन्नताओं के बावजूद हमें एकता के सूत्र में बाधे रही हो, वह चंद सिरफिरों की वजह से विखर जाएगी? विविधिता में एकता के सिद्धांत ने भारत को अदभुत राष्ट्र के रूप में दुनिया में स्थापित किया है, साथ ही समाजशास्त्रियो के द्वारा दी गई राष्ट्र की परिभाषा को भारत ने ही गलत साबित किया है. जो एक समूह के साझा इतिहास, एक भाषा, एक धर्म, एक जातीय और समाज के सामान्य उद्देश्य को राष्ट्र की परिभाषा बताते रहे थे. अर्नेस्ट बार्कर के अनुसार "राष्ट्र ऐसे मनुष्यों का एक समुदाय है. जो एक निश्चित प्रदेश में रहते है, जो सामान्य रूप से विभिन्न जातिओं से मिलकर बने होते है. सामान्य विचार और आदर्शो की एकता पाई जाती है. उनका धर्म लगभग एक ही प्रकार का होता है. वे अपने भावो, विचारों को व्यक्त करने के लिए एक ही भाषा का इस्तेमाल करते है. सामान्य इच्छा और भावना होती है." इसी परिभाषा के आधार पर जॉन स्ट्रेची ने तो भारत को एक राष्ट्र मानने से ही इंकार कर दिया था. उसने तो यहा तक कह दिया था कि "अतीत में भारत राष्ट्र नाम की कोई चीज ही नही थी और न ही आगे होने की संभावना है." के निहितार्थ
भारत जहां लगभग दुनिया के हर धर्म के अनुयायी यहूदी, पारदी. इसाई, मुस्लिम, जैन, बोद्ध और हिन्दू, हजारों बर्षो से साथ रहते आ रहे हैं. भारत का स्वरूप न केवल भौगोलिक विविधिता से भरा हुआ है बल्कि सांस्कृतिक और भाषाई भी रूप से भी बाहुलता को सजोये हुए है. भारतियों ने न केवल आपसी समन्वय के साथ राष्ट्रियता का परिचय दिया बल्कि क्षेत्र, भाषा. धर्म की विभिन्नताओं में एकता का सिद्धांत प्रतिपादित किया. इससे इतर इतिहास के विद्धवान राष्ट्रावाद को केवल परिस्थितिओं की उपज मानते है जो यूरोप में रोम साम्राज्य के पतन के साथ चर्च-राज्य संघर्ष से उपजी राजव्यवस्था है.
यूरोप की तात्कालिक विकेन्द्रीकृत सत्ता को संगठित करने के लिए सर्वसत्ताधारी सम्प्रभुता और केंद्रीकृत राज्य की स्थापना हुई. अट्ठारहवीं सदी में जब सामंतवाद चारों तरफ़ पतनोन्मुख हुआ और युरोप औद्योगिक क्रांति के दौर से गुज़र रहा था, तब पूँजीपति वर्ग राष्ट्रवाद की विचारधारा के तले एकताबद्ध हुए। उन्होंने ख़ुद को एक समरूप और घनिष्ठ एकता में बँधे राजनीतिक समुदाय के प्रतिनिधियों के तौर पर देखा। अधिक सुख की चाह, निजी सम्पति के मालिक बानने की इच्छा ने उन्हें मौजूं गरीबी धार्मिक रूढीवादी विचारों से और राजा के आत्याचार से मुक्ति पाने के लिए जगह-जगह विद्रोह होने लगे और स्थानीय विद्रोह का लाभ उठा कर पूँजीपति वर्ग राजशाही के ख़िलाफ़ सम्पूर्ण राष्ट्रवादी आंदोलन की शुरुआत की. जिसके फलस्वरूप नये संप्रभुता सम्पन्न, निजी अधिकारों और केन्द्रीय शासनव्यव्स्था से लैस राष्ट्र-राज्यों की स्थापना हुई. फ्रांस की क्रांति और ब्रिटेन में सविधानिक सुधारों के साथ धीरे- धीरे आगे पुरे यूरोप में फैल गई.
18 वी और 19 वी सदी पश्चमी राष्ट्रवाद की जननी रही, तो वहीं 20 वी सदी का आरम्भ राष्ट्रवाद का विकृत रूप लेकर आया. जिसने जोसेफ़ स्टालिन, एडोल्फ हिटलर और मार्शल टिटो जैसे तानाशाह को पैदा किया. प्रथम विश्वयुद्ध और द्वतीय विश्वयुद्ध में राष्ट्रवाद ने ही सुलगती आग में घी डाला और लाखों लोगों के खून से अपनी प्यास बुझाई. जर्मनी में हिटलर ने राष्ट्रवाद के नाम पर ही 60 लाख यहुदिओं को जलती आग की भट्टी में झोंक दिया था. भारतीय उपमहाद्वीप के बिखराव का कारण यही विकृत राष्ट्रवाद ही था. जिसके प्रभाव में जिन्ना ने टू नेंशन थियोरी के आधार पर भारत की छाती को चीरकर पाकिस्तान की नीव डाली. आज तक उस छाती का घाव नही भर पाया है. इसी आग में मध्य एशिया एक दशक से भी ज्यादा समय से उबल रहा है. फिलिस्तीन और इजरायल के बीच छिड़ी जंग ने न जाने कितने मासूमों की जान ली. अब तक दोनों देशों के बीच पांच युद्ध होने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है. यूरोप में जिन परीस्थियों में राष्ट्रवाद ने जन्म लिया वैसी स्थिति भारत सहित एशिया के कई देशों में नही थी.
यूरोपीय लोगों की अलग संस्कृति और सभ्यता है. अलग विचार और अलग जीवनशैली है. जिसका प्रभाव उनकी शासनव्यवस्था में समाहित हुआ लेकिन ठीक उसी विचार या व्यवस्था को जब पृथक विचारो, रहन-सहन और भिन्न संस्कृति-सभ्यता के लोंगो ने अपनाया जिसका परिणाम आज भी ये देश भूगत रहे है. यूरोप में जिन परीस्थियों में राष्ट्रवाद ने जन्म लिया वैसी स्थिति भारत सहित एशिया के कई देशों में नही थी. इस के ठीक उलट भारत के प्राचीन इतिहास से लेकर आज तक कभी भी शासनव्यवस्था हमारे राष्ट्रवाद की धुरी नही रही है. भारत में संस्कारिक और धार्मिकता से होकर मानव प्रेम और वसुधैव कुटुंबकम को राष्ट्र का ध्येय माना जाता रहा है. हमें अपनी मातृभूमि माता तुल्य पूजनीय और स्वर्ग से भी प्रिय है. हजारों साल पहले रचित वेदों में भूमि को 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी' की उपमा दी गई है. श्री कृष्ण द्वारा भारतवर्ष की स्थपना हो. या आचार्य चाणक्य की कूटनीति से सिकंदर से मिली जीत. उन्ही के द्वारा स्थापित किया गया अखण्ड भारत जिसे चन्द्रगुप्त मौर्या और सम्राट अशोक ने आदर्श भारत बनाया. मध्य काल में गुप्त साम्राज्य (श्री गुप्त, समुद्र गुप्त, विक्रमादित्य) ने भारतीय साम्राज्य का परचम पुरे भारतीय उपमहाद्वीप में फहराया. कितने ही विदेशी आक्रमणों से जूझते हुए भारत एक अखण्ड भारत ही बना रहा. भोगौलिक असमानता, भाषाई भेद के बावजूद भारत पर जब जब मुश्वित आई समस्त भारतियों ने मिलकर उसका सामना किया.
कितनी ही विदेशी जातिया भारत आई पर सब भारतीय हो गई. यही है असली राष्ट्रवाद जो हमेशा समस्याओं के दौरान भारतीय विभिन्नता को राष्ट्रीय एकता की भावना में परिवर्तित कर देता है. राष्ट्रीयता की भावना ही नागरिकों को राष्ट्र के प्रति समर्पण और समाज के उत्थान के प्रति निरंतर प्रयासरत रहने के लिए प्रेरित करती है. इसी भावना ने आधुनिक भारत के समाज सुधारक राजा राममोहन राय, ईश्वर चन्द विद्यासागर, दादा भाई नौराजी, गोपाल क्रष्ण गोखले और महात्मा गाँधी जैसे राष्टीय चरित्र निर्माणकरीओं ने राष्ट्र पर आई विपत्तियों और झुकते भारत को पुनः राष्ट्रीय गौरव प्रदान किया. भारत वसुधैव कुटुम्बकम्’ की उदार भावना को लेकर चला है। आज हमारा जो भी अस्तित्व सुरक्षित है, जितनी भी हमारी निधि है, यह सब हमारे उच्च व्यवहार और सदाचार का ही परिणाम है। राष्ट्र में समस्या आती है विपदाएं घेरती है लेकिन राष्ट्र की चेतना व्यक्ति के माध्यम से आपने हर मुश्किल हालातों का सामना करता है और निरंतरता बनाये रखता है. राष्ट्र का स्वाभिमान बनाये रखना और राष्ट्रीय भावना को एकता के सूत्र में पिरोये रखकर चुनौतिओं का सामना करना हमें हमारे इतिहास ने सिखाया है. कितने ही विदेशी आक्रमण हुए क्रूर शासक आये और चले गए पर भारत था, है, और रहेगा।
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