वैचारिक उग्रवाद के दौर से गुजर रहे इस मुल्क को अपनी सांस्कृतिक सामरिक पहचान बनाये रखने के लिए समाज के वुद्धिजीविओं और समाजशास्त्रीओं को ही आगे आना होगा। शासन का काम नियम ,कानून और सुरक्षा व्यवस्था कायम करना होता है। समाज उचित दिशा और दशा तय करे इसके लिए आजकी पीढ़ी को उचित मार्गदर्शन की नितांत आवयश्कता है। लोकनीति, नैतिकता ,लोक व्यवहार, पारिवारिक और सामाजिक नियमों को अपनी स्वतंत्रता में खनन मानती ये पीढ़ी और अपनी निरंतर बढ़ती भोगवादी इच्छाओ को प्राप्त करना, सभ्यता और संस्कृति को गाली देना, अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करने देना इनकी आज़ादी की पहली शर्त है, यदि इसमे किसी खनन डाला तो वो इनके अधिकारों का हनन हैं। इन विचारों से प्रभावित होने पर अनुशासन, जबाबदेही, देशप्रेम और आत्मिक उन्नति जैसी अवधारणो को समझने मे असमर्थ होती युवा आबादी का बड़ा हिस्सा जिस के बल पर हम दुनिया के सामने सीना तान रहे है, अगर इन्हें सही मार्गदर्शन नही मिला तो भविष्य में इसके परिणाम घातक हो सकते है। धार्मिक उग्रवाद हो या वैचारिक उग्रवाद दोनों ही समाज के लिए पतन का कारण होते हैं। इसलिए विरोधी स्वर को सुधारात्मक स्वर में बदले बिना देश मुख्य समस्याओं जैसे गरीबी, सामाजिक विघटन, साम्प्रदायिकता जैसी विकराल समस्याओं का समाधान नही कर पायेगे। मैजूदा हालातो में बढ़ती युबा आवादी को प्रतिभावान और वैचारिक सशक्तिकरण करना अतिआवश्यक हैं। स्वामी विवेकानंद ने कहा था "हम बालू पर राष्ट्र निर्माण नही कर सकते, उसके लिए एक ठोस आधार एक चट्टानी नीव चाहिए और वह केवल चरित्र निर्माण के द्वारा ही हासिल किया जा सकता हैं।"
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