बुधवार, 24 सितंबर 2014

मद्रास उच्च न्यायालय बनाम सुचना के अधिकार

हालही में मद्रास उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में सुचना के अधिकार (आरटीई) के तहत मांगी  जाने वाली जानकारी प्राप्त करने के लि ए आवेदक को उसका कारण या मकसद बताने  का आदेश दिया हैं जो काफी निराजनक हैं कोर्ट का ये फैसला ऐसा पहला आदेश होगा जो किसी कानून को कमजोर बनता है
                            सूचना का अधिकार की धरा 6 (२) कहती हैं की सुचना प्राप्त करने वाले आवेदक को उसके लिए कोई बजह नही बतानी होगी। ऐसा इसलिए किया गया ताकि मौलिकाधिकार के रूप मैं जो सुचना का अधिकार जनता को दिया जा रहा है उसका उपयोग आम नागरिक कर सके और यदि उससे सूचना के लिए दलील मांगी जाएगी तो ये अधिकार कहा रह जायेगा और फिर दलीलों का भी  तो अंत नही है । सुचना के अधिकार मै 6 (2) इसीलिए रखी गई थी ताकि सुचना प्राप्त करने मई नागरिको को समस्या न आये ।
                          मद्रास उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा की (आरटीआइ) के तहत सुचना मागने पर आवेदक को उसका कारण बताना होगा । मालूम हो की जब सुचना का अधिकार संसद में  आया तो सरकार और संसद ने पहले ही इसकी मर्यादा की सीमारेखा बांध दी थी। कुछ प्रकार सूचनाओं को सार्वजानिक करने जैसे ख़ुफ़िया एजेंसी और  सेना से संबन्धित जानकारी को इस अधिकार के तहत नही लाया गया
 यह अधिकार भारतीय जनता को काफी लम्बे संघर्ष के बाद प्राप्त हुआ जहॉ ऑस्टेलिया सहित कई यूरोपीय देशो मे तीन दशक पहले ही मिल गया उसे भारत में 2005 यानि 9 बर्ष पहले मिला जिसे  भारतीय जनमानस ने भ्र्ष्ट प्रशासन से लड़ने के लिए एक सशक्त हथियार के रूप में  देखा गया। मद्रास उच्च न्यायालय का ये फैसला काफी निराशाजनक है ।

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

ख़तरे मे सेहत की दोलत

तेजी से विकसित हो  रहा  मध्यप्रदेश हर क्षेत्र में प्रगतिशील हैं।  पिछले दो सालो से स्टेट ऑफ़ दी ईयर के अवार्ड से भी नवाज जा चुका हैं। मध्यप्रदेश एक बीमारू राज्य से निकल कर विकसगित प्रदेश की ओर अग्रसर  है। इसकी वाहवाही भी शिवराज सरकार  को मिल रही है जिसके वो हक़दार भी है। लेकिन स्वास्थ जैसी बुनियादी समस्याओं पर भी बीजेपी सरकार को महत्वपूण कदम उठाने चाहिए। ऐसा नही है कि सरकार ने  पिछले सालों मे कोई  कदम नही उठाया हैं। सरकार ने  2014 -15 के कुल वजट का  तीन से चार फीसदी  चिकित्सा क्षेत्र  है 'एम्स'  के रूप में एक सम्पूर्ण सुपर स्पेशलिटी अस्पताल प्रदेश  को मिला हैं। हलाकि उसे तैयार होने दस वर्ष से ज्यादा का समय लग गया। 'मेदांता' और 'अपोलो' जैसे बड़े ग्रुप  की भुमिका  भी शुरू होने को तैयार है। मगर सेहत के उजले पक्ष का एक और पहलु भी  है जिसमें मेडिकल कॉलेजों में ही नही वल्कि जिला अस्पतालों और उप और प्राथमिक मेडिकल स्वास्थ केन्द्रों के हालत तक बेहाल है। चिकित्सकों और पैरामेडिकल स्टाफ के हजारो खाली पद और बुनियादी सुविधाओं का काफी बभव है। ऐसे में सेहत की दौलत की हिफाजत करना टेढ़ी खीर हैं। सात करोड़ से ज्यादा  की जनसंख्या केलिए केवल अस्पतालों में मात्र दस हजार से भी कम विस्तर हैं।आवश्यकता 'पचास हजार' से ज्यादा विस्तरों की है। अन्य सुविधाओं का भी इसी प्रकार से अभाव  हैं। सरकारी  नौकरी होने के वावजूद नियमविरुद्ध नर्सिंग होम व क्लीनिक का संचालन कर रहे कई चिकित्सक मन मने ढ़ग से रुपये वसूल करते हैं।  प्रदेश में निजी नर्सिंग होम की सख्या 1365 है और जिला अस्पताल  मात्र 51 है जिन पर सात करोड़ जनसख्या चिकित्सा के लिए निर्भर हैं। भारत ही ऐसा देश जहां 70 फ़ीसद स्वस्थ खर्च व्यक्ति अपनी जेब से करता है अन्य देश मे मात्र 25 फीसद खर्च ही व्यक्ति अपनी जेब से करता है।
                                                                                                                                           
                                                                                                                                        १२-६ -2014