1914 में ब्रिटिश भारत के विदेश सचिव हेनरी मैकमोहन और तिब्बत के बिच हुए सीमा समझौते को चीन नही मानता। वह इस रेखा को अवैधानिक बतता है और अरुणचल प्रदेश और लदाख के अक्साई चिन को दक्षिण तिब्बत चीन का हिस्सा मानता है। तमाम विवादों और देश के बटवारे के साथ अंग्रेज ये जख्म भी हमें दे कर गए जो धीरे धीरे और बड़ा होता गया। वो चीन जो इससे पहले हमारा सबसे करीबी मित्र और सहयोगी हुआ करता था वो हमारा सबसे बडा शत्रू बन गया। 1950 के दशक में लगे हिंदी चीनी भाई भाई के नारे भी इस कड़वाहट को कम नही कर सके। 1962 के युद्ध और इसके बाद बनी परिस्थितीयों ने भारत चीन सम्बधों को और जटिल बना दिया। शीतयुद्ध के समय दोनों देशों के रिश्ते कमजोर ही बने रहे। फिर वक्त आया 1991 का जब मनमोहन और पीवी नरसिम्हा राव की जोड़ी ने आर्थिक सुधार के चलते उदारीकरण का रास्ता अ़़ख्ति़यार किया और अपनी देश की सीमा को विदेशी व्यापार के लिए खोल दिए। तब उम्मीद की गई कि व्यापार के रास्ते ही टूटे रिश्तों कि डोर फिर से जुड़ जाये। लेकिन इसके बाद तो ये देश सीमा विवाद के साथ अब आर्थिक प्रतिस्पर्धा के दंगल में उतर आया। महत्वकांक्षी चीन एशिया का सरताज बनना और विश्वशक्ति अमेरिका की जगह चाहता है। वहीं भारत बढ़ती आर्थिक शक्ति के रूप में आगे बढ़ रहा है और अपनी सैन्य शक्ति को भी बढ़ा रहा हैं। जिसे चीन अपने हितों के विपरीत देखता है। उसे लगता है कि भारत उसके प्रभाव को कम कर सकता है। वहीं युद्ध झेल चुके भारत को ये शंका बनी रहती है कि चीन अपनी विस्तारवादी नीति के चलते फिर हमला न कर दे। चीन के अड़ियल रुख के चलते टकराव के आसार बने रहते है। भारत और जपान सहित कई दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के साथ चीन के सम्बंध गर्माहट भरे है। मलेसिया, वियतनाम, फिलीपांइस,ताइवान, ब्रुनेई के साथ उसके समुद्री विवाद चरम सीमा पर हैं। चीन की बदलती तस्वीर यानी तेज गती से बड़ती आर्थिक और सैन्य शक्ति से चीन के तेबर गर्म है।इसलिए चीन द्वपाक्षीय वार्ता की जगह धमकी और धोस से अपनी बात मनवाना चाहता। लेकिन भारत भी 1991 के बाद बढ़ती आर्थिक और सैन्य क्षमताओं में लगातार वृद्धी कर रहा है। जो चीन की परेशनी का सबब बना हुआ है। इसलिए अब सीधे युद्ध न लाड़कर वह देश के पुर्वोत्तर राज्यों सहित पाकिस्तान में भारत के खिलाफ पल रहे अराजक तत्वों की सहयता करता है ताकि भारत के विकास में रूकावट डाली जा सके। चूकीं वो जनता है कि विकासशील भारत एशिया की उम्मीद बन रहा है। जो देश चीन से सीधे टक्कर नही ले सकते वो भारत को अपना हितैसी मानकर ये उम्मीद करते है कि विवादित मसलों को सुलझाने में वो उनकी मदद करेगा। जिसे चीन अपनी कूटनीतिक हार मानता है और भारत को आगे बढ़ने से रोकता है। वर्तमान में नई सरकार के आने के बाद विदेश नीति में आये परिवर्तन से भारत की स्थिती विश्व समुदाय में कितनी सशक्त हुई ये तो आने वाल वक्त ही बताएगा। लेकिन एक मजबुत सरकार के चलते उसकी निर्णय क्षमता और दुसरे मुल्कों से बेहतर होते रिश्तों ने चीन को ये सन्देश दे दिया है कि भारत अब किसी से कम नही है। वो अपने हितों की रक्षा करने में सक्षम हैं। लेकिन चीन इतनी जल्दी झुकने वाला नही है। वह किसी न किसी तरिके से भारत का उलझाये रखना चाहता हैं। इसीलिए वह सीमा विवाद को जल्द ख़त्म न करके केवल आदर्श संहिता के जरिये इस विवाद को जिन्दा रखना चाहता है ताकि भारत इस विवाद से अपना ध्यान न हटा सके और विकास में उसका पिछलग्गू बना रहे। पाकिस्तान से मिलकर वह जिस औध्योगिक गलियारे का निर्माण पाक अधिकृत जम्बू कश्मीर में कर रहा है वह इसी रणनीति का हिस्सा है। अब भारत ने चीन को उसी की भाषा में जबाब देने की रणनीति पर प्रमूखता से अमल किया है। पुर्वोत्तर नीति के तहत आरुणचल प्रदेश सहित सभी पुर्वोत्तर राज्यों के विकास कार्यो में तेजी लाई गई हैं। भारत को घेरने की रणनीति में शामिल चीन की बहूउद्देशिय सिल्क रोड़ योजना के जबाब में भारत ने हिंद सागरमाला पर काम कर रहा है। दूश्मन के दूश्मन से हाथ मिलाने की नीति में भारत ने जापन और अमेरीका जैसे देशों से अपने संबध मजबूत किए हैं। जिसके चलते उसके पेट में मरोड़ उठना स्वभाविक हैं।
शुक्रवार, 12 जून 2015
बुधवार, 10 जून 2015
भूमंडलीकरण के निहितार्थ
भूमंडलीकरण के शाब्दिक अर्थ को सबजन सुखाय और बासुदेव कुटुंब्कम के साथ जोड़ा जाता हैं। इसको ऐसे परिभाषित किया जाता है मानो भूमंडलीकरण का सूत्रपात हर व्यक्ति को सहयोग और सुख देने के लिए हुआ हैं। पर वास्तविक स्तिथि इसके ठीक उलट हैं। एडम स्मिथ के विश्व व्यापार सिद्धांत से लेकर ब्रेटनवुड प्रणाली पर आधारित विश्व व्यापर पद्दति में कही भी सबजन हिताय सबजन सुखाय का जिक्र तक नही होता और न ही ऐसा देखने को मिलता है कि भूमंडलीकरण से किसी देश की आर्थिक सामाजिक स्थिति में बदलाब आया हो। वास्तव में ये भ्रम हमारे दिमाग में पैठा दिया गया कि दुनिया के विकाश के लिए भूमंडलीकरण का जन्म हुआ लेकिन सत्यता ठीक इसके उलट हैं। विश्व की वर्तमान स्थिति के अनुसार विश्व की 70 प्रतिशत आबादी अविकशित क्षेत्रों में निवास करती हैं। विश्व की 70 प्रतिशत लोग दो डॉलर से कम पर गुजरा कर रहे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार 2011 में निर्धनतम देश 1980 के मुकाबले ज्यादा गरीब हो गए। इन देशों का धन चुनिंदा पूजीपतिओं की जेबों में समा गया। आक्सेफैम (अंतरराष्ट्रीय एजेंसी) के रिपोर्ट अनुसार 8 वर्षो में विश्व की 51 प्रतिशत पूंजी 1 प्रतिशत लोगों के हाथो में पहुंच जाएगी जो 2009 में 48 प्रतिशत थी। इसका एक करण तो यह रहा कि पश्चिमी विकशित मॉडल की चाह में इन देशों ने विकशित देशों से कर्ज लिया और विकास के स्वर्णमृग का पीछा करते ये इस स्थिति तक आ गये कि अब बिना विदेशी पूँजी के अपने देश की अर्थव्यवस्ता तक नही चला सकते। भारत के यूपीए सरकार के बित्त मंत्री पि. चिदंबरम ने 2012 में संसद में बजट पेश करते हुए ये चिंता जाहिर की थी कि "भुगतान शेष में भरी कमी के चलते विदेशी मुद्रा की कमी के कारण विदेशी निवेश और विदेशी ऋण मज़बूरी बन चूका हैं।" दुसरी वजह यह है की भूमंडलीकरण मुद्रा प्रवाह में आने वाली रुकावटों को तो दूर करता हैं। पर मनुष्य को सरहदी दीवारों में बांध कर रखना चाहता हैं। लोगों को बाजार के जरीहे तो जोड़ना चाहता है सामाजिक स्तर पर नही। आधुनिक युग में 'दुनिया एक गांव है' तो वह एक खूबसूरत जगह हो सकती थी विषमताए तो गांव में भी होती हैं। लेकिन अपनापन भी होता हैं। लोग कहि भी आने जाने के लिए स्वतंत्र होते, हाल तक इतिहास में लोग अकाल पड़ने, अधिक अत्याचार या युद्ध की स्तिथि ने निपटने के लिए लोग पुराने इलाके छोड़कर नई जगहों पर बस जाते थे। ऐसी तरह लोक एक इलाके से दूसरे इलाको में आव्रजन करते थे। भारत में शक ,हुण और कुषाण और कई धुमंतू जातियां आई। यहुदी और पारसी भी इस्लाम के अत्याचार से बचने का लिए भारत आये। अमेरिका और भारत की खोज भी समृद्धि की खोज का हिस्सा थी। लेकिन जब यूरोपीय राष्ट्रों ने विश्व के समृद्धि भूखंडों पर कब्जा कर लिया तो जान समुदाओं के आव्रजन पर पाबंदी लगा दी। दिलचस्प तो यह है कि जब सस्ते श्रम की आवश्यकता होती है तो उनका ये दर्शन बदल जाता है। भूमंडलीकरण का मुख्य उद्देश्य लाभ अर्जित करना हैं। सस्ते श्रम का लाभ, प्राकतिक संसाधनों का दोहन कर उपभोग संस्कृती को बढ़वा देना। दृतीय विश्व युद्ध के बाद जो अर्थव्यवस्थाएं कड़ी हुई वो आज भी जीवंत हैं। पर इन 70 सालों में विश्व के शाक्तिशाली संगठन जी7 में कोई अन्य देश क्यों नही जुड़ पाया। जी8, जी9 या जी10 क्यों नही बन पाया? फिर भूमंडलीकरण के पैरोकार पश्चिमी देशों से कैसे अविकसित देशों में सुधार की उम्मीद की जा सकती है। सत्यता यही है कि भूमंडलीकरण के बाद इन देशों को आर्थिक शोषण तो हुआ ही साथही अविवाहित मातृत्व , नस्लवाद, नशे की लत, अधकचरा आधुनिकीकरण, और भ्रष्टाचार ने तीसरी दुनिया को अपने ग्रास में ले लिया और विश्व युद्धों की हिंसा में झोक दिया।
रविवार, 7 जून 2015
अंधकार में भविष्य के र्निमाता
बच्चे भविष्य के र्निमाता होते है लेकिन तब क्या हो जब इन कर्णधारों का भविष्य
ही अंधकार में हो? बड़ते भारत में लापता बच्चों की संख्या लाखो में है। पर सरकार से लेकर
प्रशासन तक बेपरवाह हैं। ग्रह मंत्रलाय के अनुसार 2014 में लापता बच्चों की संख्या
68000 के आस-पास है इनमे लडकियों की संख्या 63 फीसदी हैं। भारत में हर आठ मिनट में
एक बच्चा तस्करी का शिकार हो जाता है। पश्चिम बंगाल, महाराष्ट और दिल्ली राज्यों में
लापता बच्चों की संख्या सबसे अधिक है। मानवता के खिलाफ इस जघंतम अपराध की जड़े
गहराई तक जुड़ी हुई हैं। एशिया में भारत को मानव तस्करी का गढ़ माना जाता है।
तस्करी के शिकार इन बच्चों का यौन शोषण, मजदूरी और अंगों की तस्करी के रुप में
इस्तेमाल किया जाता हैं। बच्चों के प्रति अपराधो पर सर्वोच न्यायालय तक चिंता
जाहिर कर चुका हैं। 2013 में देश की सर्वोच्च न्यायालय ने 1.7 लाख गुम बच्चों की
संख्या और उसके प्रति सरकार कि बेरुखी के चलते प्रतिक्रिया दी थी कि ‘यह बिड़वना ही है कि किसी
को गायब होते बच्चों की फ्रिक ही नही है’ बच्चों के प्रति जवाहरलाल नहरु से लेकर
प्रधानमंत्री तक का प्रेम जगजाहिर है। नेहरु कि भाति मोदी भी बच्चों से संवाद करते
है अपने रेड़ियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ के जारिए उनसे जुड़ने की कोशिश करते है। लेकिन कुल आबादी
का 40 फीसद बच्चों की सुरक्षा और इतनी बड़ी संख्या में गायब हो रहे बच्चों को
ढुड़ना किसी की प्रथामिकता में नही हैं। जो ये दर्शाता है कि हमारे नैनिहाल जो इस
सभ्य और सक्षम भारत की नीवं बन सकते है वो आज किसी की प्रथामिकता में नही हैं।
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