रविवार, 9 अगस्त 2015

संसद में गतिरोध

संसद में  गतिरोध लगातार तीसरे हफ्ते जारी रहा और इसी के साथ मानसून सत्र आपने आखरी हफ्ते में प्रवेश कर गया। विपक्ष के तेवर को देखते हुए ये उम्मीद कम है कि सत्र के अंतिम दिनों में संसद चल पाएगी। इस हगामें का असर देश की आर्थीक गति पर पड़ेगा। इस सत्र करीब तीस विधेयक पारित होने हैं। जिनमें वस्तु एंव सेवा कर, भुमी अधिग्रहण, रीयल स्टेट और श्रम सुधार विधेयक आर्थिक विकास संवृद्धि को बढ़ाने के लिए महत्वपुर्ण हैं। दो अकों की विकास दर को पाने के लिए इन विधेयकों  का पारित होना आवश्यक हैं। साथही देश के सामने आंतकवाद  और आईएसआईएस के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए  व्यापक चर्चा हो। इस के लिए आवश्क है कि संसद में चर्चा का आनुकूल माहौल बने। हमारे राजनैतिक दलों को ये  कर्तव्य है कि वो अवरुद्ध चर्चा को बहाल करें। विपक्ष अगर से समझ रहा है कि उसका जिम्मेदारी  केवल सत्ता दल  के काम में अड़गा डा़लना है तो जनता ये समझ रही है कि देश के विकास में बाधा कौन पहुचा रहा हैँ। विपक्ष भी जनता का प्रतिनिधी है उसका जबावदेही जनता के प्रति हैं। न की राजनैतिक हित साधना। संसद का प्रतिदिन का खर्चा 6 करोड़ रुपए आता है जो देश की आवाम के खुन-पसीने की कमाई है। संसद में उठने वाले प्रश्नों से ही भविष्य की रणनीतिया तैयार होती है। अपने क्षेत्रों से  चुनकर आए संसदों कि ये जिम्मेदारी है कि वो क्षेत्रों से जुड़े मुददों को संसद में उठायेगे और उनके जिंदगी को आसान बनाने में सहायक होगे।