तेजी से विकसित हो रहा मध्यप्रदेश हर क्षेत्र में प्रगतिशील हैं। पिछले दो सालो से स्टेट ऑफ़ दी ईयर के अवार्ड से भी नवाज जा चुका हैं। मध्यप्रदेश एक बीमारू राज्य से निकल कर विकसगित प्रदेश की ओर अग्रसर है। इसकी वाहवाही भी शिवराज सरकार को मिल रही है जिसके वो हक़दार भी है। लेकिन स्वास्थ जैसी बुनियादी समस्याओं पर भी बीजेपी सरकार को महत्वपूण कदम उठाने चाहिए। ऐसा नही है कि सरकार ने पिछले सालों मे कोई कदम नही उठाया हैं। सरकार ने 2014 -15 के कुल वजट का तीन से चार फीसदी चिकित्सा क्षेत्र है 'एम्स' के रूप में एक सम्पूर्ण सुपर स्पेशलिटी अस्पताल प्रदेश को मिला हैं। हलाकि उसे तैयार होने दस वर्ष से ज्यादा का समय लग गया। 'मेदांता' और 'अपोलो' जैसे बड़े ग्रुप की भुमिका भी शुरू होने को तैयार है। मगर सेहत के उजले पक्ष का एक और पहलु भी है जिसमें मेडिकल कॉलेजों में ही नही वल्कि जिला अस्पतालों और उप और प्राथमिक मेडिकल स्वास्थ केन्द्रों के हालत तक बेहाल है। चिकित्सकों और पैरामेडिकल स्टाफ के हजारो खाली पद और बुनियादी सुविधाओं का काफी बभव है। ऐसे में सेहत की दौलत की हिफाजत करना टेढ़ी खीर हैं। सात करोड़ से ज्यादा की जनसंख्या केलिए केवल अस्पतालों में मात्र दस हजार से भी कम विस्तर हैं।आवश्यकता 'पचास हजार' से ज्यादा विस्तरों की है। अन्य सुविधाओं का भी इसी प्रकार से अभाव हैं। सरकारी नौकरी होने के वावजूद नियमविरुद्ध नर्सिंग होम व क्लीनिक का संचालन कर रहे कई चिकित्सक मन मने ढ़ग से रुपये वसूल करते हैं। प्रदेश में निजी नर्सिंग होम की सख्या 1365 है और जिला अस्पताल मात्र 51 है जिन पर सात करोड़ जनसख्या चिकित्सा के लिए निर्भर हैं। भारत ही ऐसा देश जहां 70 फ़ीसद स्वस्थ खर्च व्यक्ति अपनी जेब से करता है अन्य देश मे मात्र 25 फीसद खर्च ही व्यक्ति अपनी जेब से करता है।
१२-६ -2014
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