हालही में मद्रास उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में सुचना के अधिकार (आरटीई) के तहत मांगी जाने वाली जानकारी प्राप्त करने के लि ए आवेदक को उसका कारण या मकसद बताने का आदेश दिया हैं जो काफी निराजनक हैं कोर्ट का ये फैसला ऐसा पहला आदेश होगा जो किसी कानून को कमजोर बनता है
सूचना का अधिकार की धरा 6 (२) कहती हैं की सुचना प्राप्त करने वाले आवेदक को उसके लिए कोई बजह नही बतानी होगी। ऐसा इसलिए किया गया ताकि मौलिकाधिकार के रूप मैं जो सुचना का अधिकार जनता को दिया जा रहा है उसका उपयोग आम नागरिक कर सके और यदि उससे सूचना के लिए दलील मांगी जाएगी तो ये अधिकार कहा रह जायेगा और फिर दलीलों का भी तो अंत नही है । सुचना के अधिकार मै 6 (2) इसीलिए रखी गई थी ताकि सुचना प्राप्त करने मई नागरिको को समस्या न आये ।
मद्रास उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा की (आरटीआइ) के तहत सुचना मागने पर आवेदक को उसका कारण बताना होगा । मालूम हो की जब सुचना का अधिकार संसद में आया तो सरकार और संसद ने पहले ही इसकी मर्यादा की सीमारेखा बांध दी थी। कुछ प्रकार सूचनाओं को सार्वजानिक करने जैसे ख़ुफ़िया एजेंसी और सेना से संबन्धित जानकारी को इस अधिकार के तहत नही लाया गया
यह अधिकार भारतीय जनता को काफी लम्बे संघर्ष के बाद प्राप्त हुआ जहॉ ऑस्टेलिया सहित कई यूरोपीय देशो मे तीन दशक पहले ही मिल गया उसे भारत में 2005 यानि 9 बर्ष पहले मिला जिसे भारतीय जनमानस ने भ्र्ष्ट प्रशासन से लड़ने के लिए एक सशक्त हथियार के रूप में देखा गया। मद्रास उच्च न्यायालय का ये फैसला काफी निराशाजनक है ।
सूचना का अधिकार की धरा 6 (२) कहती हैं की सुचना प्राप्त करने वाले आवेदक को उसके लिए कोई बजह नही बतानी होगी। ऐसा इसलिए किया गया ताकि मौलिकाधिकार के रूप मैं जो सुचना का अधिकार जनता को दिया जा रहा है उसका उपयोग आम नागरिक कर सके और यदि उससे सूचना के लिए दलील मांगी जाएगी तो ये अधिकार कहा रह जायेगा और फिर दलीलों का भी तो अंत नही है । सुचना के अधिकार मै 6 (2) इसीलिए रखी गई थी ताकि सुचना प्राप्त करने मई नागरिको को समस्या न आये ।
मद्रास उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा की (आरटीआइ) के तहत सुचना मागने पर आवेदक को उसका कारण बताना होगा । मालूम हो की जब सुचना का अधिकार संसद में आया तो सरकार और संसद ने पहले ही इसकी मर्यादा की सीमारेखा बांध दी थी। कुछ प्रकार सूचनाओं को सार्वजानिक करने जैसे ख़ुफ़िया एजेंसी और सेना से संबन्धित जानकारी को इस अधिकार के तहत नही लाया गया
यह अधिकार भारतीय जनता को काफी लम्बे संघर्ष के बाद प्राप्त हुआ जहॉ ऑस्टेलिया सहित कई यूरोपीय देशो मे तीन दशक पहले ही मिल गया उसे भारत में 2005 यानि 9 बर्ष पहले मिला जिसे भारतीय जनमानस ने भ्र्ष्ट प्रशासन से लड़ने के लिए एक सशक्त हथियार के रूप में देखा गया। मद्रास उच्च न्यायालय का ये फैसला काफी निराशाजनक है ।
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