ओरछा: राजा राम के रूप में पूजे जाते है भगवान श्री राम
देश भर में
पुरुषोत्तम राम को भगवान के रूप में पूजजाता है. लेकिन एक ऐसा मंदिर है जहां राम
की पूजा भगवान के रूप में नहीं बल्कि राजा के रूप में की जाती है. रुतबा ऐसा कि
लोकतंत्र की सरकार भी उनकी राजशाही के आगे झुकती है, उन्हें सलाम करती है. राजा राम को सूर्योदय के पूर्व और सूर्यास्त के
बाद पुलिस के जवान सलामी देते है. बुंदेलखंड की राजधानी रहे ओरछा में आज से 400 साल पहले विराजे श्रीराम का दुनिया
का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां उनकी पूजा राजा के रूप में की
जाती है.
हर रोज हजारों श्रद्धालु उनकी एक झलक पाने के लिए आते है. बताया जाता है कि राजा राम की मूर्ति स्थापना के
लिए चतुर्भुज मंदिर का निर्माण कराया जा रहा था इसलिए राजा की मूर्ति को कुछ समय
लिए महल में स्थापित कर दिया गया. जब मंदिर बनकर तैयार हुआ तो मूर्ति को चतुर्भुज
मंदिर में स्थापित करने की कोशिश की लेकिन राजा राम को कोई स्थान से हिला नहीं
पाया.
कहा जाता है कि यहां राजा राम हर रोज अयोध्या से अदृश्य रूप में
आते हैं. मंदिर में राजा राम, लक्ष्मण और माता जानकी की मूर्तियां स्थापित है सुबह मंदिर आठ बजे
से साढ़े दस बजे तक आम लोगों के दर्शन के लिए खुलता है. इसके बाद शाम को मंदिर आठ
बजे दुबारा खुलता है. रात को साढ़े दस बजे राजा शयन के लिए चले जाते है. देश में
अयोध्या के कनक मंदिर के बाद ये राजा राम का दूसरा भव्य मंदिर है.
राजा राम के मंदिर की मूर्तियों के बारे में कहा जाता है कि ये
अयोध्या से लाई गई हैं. महारानी की कहानी के मुताबिक उनकी तपस्या के कारण राजा राम
अयोध्या से ओरछा चले आए थे. पर स्थानीय लोगों का मानना हैं कि बाबर के आदेश पर
अयोध्या में राममंदिर तोड़े जाने के बाद अयोध्या के बाकी मंदिरों की सुरक्षा पर
सवाल उठने लगा. ऐसी स्थित में कई मंदिरों की बेशकीमती मूर्तियों को ओरछा में लाकर
सुरक्षित किया गया.
बताया जाता है कि शासक मधुकर शाह की पत्नी कुआरी गणेश भगवन राम भक्त थी. एक दिन ओरछा नरेश मधुकरशाह ने अपनी पत्नी से कृष्ण
उपासना के इरादे से वृंदावन चलने को कहा तो उन्होंने मना कर दिया. गुस्से में आकर राजा ने उनसे कहा कि तुम इतनी राम भक्त हो तो जाकर
अपने राम को ओरछा ले आओ. रानी ने अयोध्या पहुंचकर सरयू नदी के किनारे साधना आरंभ
की. लेकिन रानी को कई महीनों तक राजा राम के दर्शन नहीं हुए. वह निराश होकर अपने
प्राण त्यागने सरयू में कूद पड़ी यहीं जल की गहराइ में उन्हें राजा राम के दर्शन
हुए. रानी ने उनसे ओरछा चलने का आग्रह किया. उस श्रीराम ने शर्त रखी थी कि वे ओरछा
तभी जाएंगे, जब इलाके में उन्हीं की सत्ता रहे. तब महाराजा
ने ओरछा में ‘रामराज' की
स्थापना की थी, जो आज भी कायम है.
**********************************************************************
उज्जैन सिंहस्थ: महिला नागाओं का रहस्मय जीवन
नागा साधुओं का जीवन किसी रहस्य से कम नहीं होता. हर समय गायब रहने वाले नागा सन्यासी कुम्भ के समय ही नजर आते
है. कुम्भ के बाद ये कहां चले
जाते है यह आज भी रहस्य है. इनके जीवन का
रहस्य हमारे लिए आज भी कौतुहल का बिषय है. वैदिक
साहित्य में ऐसे साधुयों का वर्णन मिलता है जो जटाधारी होते है और मोक्ष प्राप्ति के लिए योग-साधना
में लीन रहते है. नागा
साधु निर्वस्त्र शारीर पर श्मशान की भस्म रमाए रहते है. उग्र रूप
धारण किए, त्रिशूल, भाल जैसे हथियारों से लेस ये साधु धर्म की रक्षा के लिए खून बहाने से भी परहेज नहीं करते. ऐसी
माना जाता है कि नगा साधुयों का उद्देश्य धर्म का प्रचार करना और
धर्म की रक्षा करना होता है.
अब तक हम पुरुष नागा
साधु के बारे में ही जानते थे. लेकिन महिला साधु भी नागा सन्यासी की तरह जीवन बीतती है. जिन्हें
अवधुतनी कहा जाता है. जहां पुरुष नागा साधु अपने उग्र स्वरूप के लिए जाने जाते है. वहीं
महिला नागा साधुओं को मर्यादित रहना होता है. महिला साध्वी को नागा साधु बनाने के लिए कठिन परीक्षा से
गुजरना होता है.अखाड़ों के नियम अनुसार जब कोई महिला सन्यासी नागा साधु बनाने के लिए आती है तो
सबसे पहले उसे ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी जाती है. उसके बाद उनका मुंडन
किया जाता है. मन से वासना और सभी इच्छायों से मुक्त हो जाने के बाद यज्ञोपित
धारण कराया जाता है जो आध्यात्मिक जन्म का प्रतीक माना जाता
है.







कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें