सोमवार, 18 मई 2015

'यथा शिक्षा तथा विचार'

हमारे शब्दों में हमारे विचारों  की अभिव्यक्ति होती हैं। चिंतन के गर्भ से उत्पन्न विचार हमारी मानसिकता को इंगित करते हैं। यघपि ये विचार हमारी शिक्षा तथा अनुभव की नींव पर जन्म लेते हैं 'यथा शिक्षा तथा विचार' यानी जैसी शिक्षा वैसे विचार। विचारों की महत्ता को रेखाकिंत करते हुए महर्षि अरविन्द ने कहा था कि "यदि भारत को अपना अस्तित्व बनाए रखना है और विश्व में अपना स्थान निर्धारित करना है तो हमारी पहली आवश्यकता होगी कि भारत का युवा विचार करना सीखे, सभी विषयों पर विचार करना  स्वतंत्र रूप से ; लाभदायक ढंक से , वस्तुओं की तह तक जाकर पूर्ण निर्णयो से मुक्त होकर, एक  तेज तलवार से मिध्याभ्यास  और पूर्वाग्रह को काटते हुए, हर प्रकार की रूढ़िवादिता को मनो भीम की गादा के प्रहार सर चूर करते हुए....।" तघपि जब  वर्तमान परिपेक्ष्य में शिक्षा आदर्श और यथार्थ से निकालकर प्रयोजनवादी हो जाए, जहां शिक्षा  का उद्देश्य केवल रोजगार सृजन करने तक सीमित हो जाता है, तब वैचारिक चिंतन का ह्रास होकर युवा प्रतिस्पर्धा  के युग में प्रवेश करता हैं। जहां नैतिक मूल्यहीनता, सामाजिक विघटन, मानसिक तनाव जैसी कई विसंगतिओं का जन्म होता हैं। प्रतिस्पर्धा के आवेश में हम उचित अनुचित के  बोध को समझने में असमर्थ हो जाते है और जन्म लेती है में और तुम की भावना। तब हम स्वयं को श्रेष्ठ समझते  और दूसरों  का तिरस्कार  करते हैं। उसकी कमियों को खोजते है और खुश होते हैं। इन सब के बीच शिक्षा का मूल्य उद्देश्य मानवीय एकता , दयाभाव , सेवा,  शिष्टता, आत्मिक उन्नति, संस्कृति और सभ्यता के प्रति लगाव जैसे पहलु काफी पीछे छूट जाते हैं। और सच होती है लार्ड मैकाले की 1832 में की गई भविष्यवाणी जो उसने ब्रटिश संसद में की थी कि भारत की आने वाली पीढ़ी  शारीर से तो भारतीय होगी पर मानसिक रुप से अंग्रेजी होगी। उसी की बनाई शिक्षा निति का अनुसरण हम आजादी के बाद भी सिद्दत से करते आ रहे हैं। रही कसर शिक्षा का निजीकरण और बाजारीकरण कर भारतीय निति निर्माताओं ने पूरी कर दी। सरकारी और प्राइवेट स्कूलों के भीच की खाई इतनी बढ़ती जा रही है कि  आने वाली पीढ़ी के मन में एक दुसरे के प्रति वैमनस्यता के साथ साथ सामाजिक स्तरीकरण भी बढता जा रहा हैं। आज बढ़ते अपराधों का कारण भी हमारी शिक्षा ही हैं। वर्तमान शिक्षा प्रणाली कोई मनुष्यत गुण उतपन्न नही करती। तत्व रहित शिक्षा जिसे स्वामी विवेकानंद 'निषेधात्मक शिक्षा' कहते हैं। एक अभावात्मक शिक्षा जो व्यक्ति की मौलिकता को कुण्ठित कर देती हैं। इसलिए शिक्षा ऐसी हो जो आज की पीढ़ी के पुरुषार्थ को सबल बनाये, उनके चरित्र और बुद्धि का विकास  करें। युवा  अपने लक्ष्य को पाने में समर्थ बन सके। तभी हम अपने देश को परम वैभव अर्थात सर्वांगीण उन्नति के पथ पर  आधारित, विश्वमानवता के कल्याण के लिए भौतिक और अध्यत्मिक उन्नति को सुनिश्चित कर सकेगे।














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