2004 में भारतीय राजनीति में जब राहुल गांधी का प्रवेश हुआ, तो चर्चाओ के बाजार में इन्हें भविष्य का नेता माना जा रहा था। बड़े जोशोखरोश के साथ इनका स्वागत हुआ। खबरिया चैनलों में राहुल की हर हरकत पर तीखी नजर रहती थी। गांव में रात बिताने, मच्छर के काटने और गरीब के घर रोटी खाने तक की खबरों को मीडिया में प्रमुखता से कवर किया जा रहा था। अपनी लोगप्रियता की चरमसीमा पर थे राहुल। जिसे 2009 के लोकसभा चुनाव की जीत ने साबित भी कर दिया की वास्तव में वो आने वाले समय के बड़े नेता हैं। लेकिन धीरे धीरे ये तिलिस्म मद होता गया। लेकिन 2014 की हार के बाद एक बार फिर राहुल की आक्रमकता लोट आई सी लगती हैं। संसद से लेकर सड़क तक वो सरकार को घेरते नजर आ रहे हैं। उनके बयानों पर राजनैतिक गलियारों में गर्माहट आ गई है जो कुछ दिनों से नदारद थी। राहुल का कायाकल्प भी ठीक समय पर हुआ जब पार्टी को उनकी बेहद जरुरत हैं। कॉग्रेस अपनी खोई जमीन को पाने के लिए राहुल की सक्रियता पर ही निर्भर करती हैं। कॉग्रेस के लिए राहुल ही वो एकलौते चहेरा हैं जिसके बल पर वो मुख्य धारा मे अपनी वापसी की उम्मीद कर सकती हैं। मैजूदा राजनितिक हालातो के चलते ने उन्हें ये मौका भी मिल गया जिसे उन्होंने बिना देरी किये भुना लिया। राहुल किसी भी मुद्दे पर मोदी सरकार को घेरने का मौका नही छोड़ते। सूट - बूट पर दिए बयान से लेकर वो लगातार सरकार पर कॉर्पोरेट परस्ती का आरोप लगा रहे है जिनमें उनकी आक्रमकता झलक रही हैं। सड़क से लेकर संसद तक भूमि अधिग्रहण बिल के जरीये वो कॉग्रेस को किसानहितैषी और सरकार को किसानबिरोधी बता रहे हैं। रेल में सफर कर आम आदमी से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं। इन सब में राहुल कितने कामयाब होते है ये तो आने वाल वक्त ही बताएगा। पर राहुल ने अलग थलग पड़े विपक्ष और कॉग्रेस मुर्दे में नई जान जरूर डाल दी हैं।
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