41 साल पहले इंदिरा और बांग्लादेश के मजीबुर्रहमान के बीच हुये सीमा समझौते को अमलीजामा पहनाकर भारतीय राजनीति ने ये साबित कर दिया की वो राष्ट्र से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दो पर आम राय रखते है जो अमूमन नजर नही आती। साथही भारत हर विवादास्पद मुद्दों का वार्तालाप और आपसी समझौते के जरिये सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध है। बाग्लादेश और भारत के भीच हुए इस समझौते की तरह क्या भारत पाकिस्तान सीमा विवाद का रास्ता खोजा जा सकता है? अगर ये मुमकिन हो जाता है तो इतिहास के पन्नों में ये सदी स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज की जायेगी।सीमा विवाद के खत्म होते ही पूरा दक्षिण एशिया में शांति और सामरिक सहयोग से सबसे समृद्धशाली और शक्तिशाली बनकर उभर सकता हैं। भारत -पाक के हुक्मरानों को जल्द से जल्द इस विवाद को खत्म करने की पहल पर आगे बढ़ना चाहिए तभी हम अपनी आवामों को 21 वी सदी की जरूरतों के अनुरूप तैयार कर उन्हें उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने में समर्थवान बना सकते हैं।
शांति और दोस्ती के बल पर ही भारत और पाकिस्तान अपनी वैश्विक पहचान बना सकते है तथा तीव्र आर्थिक और सामाजिक विकाश के लक्ष्य को पाने में कामयाब हो सकते हैं। क्या हम हिन्द-पाक के बेहतर आवामी रिश्तों की संभावना को बांग्ला समझौते में तलाश सकते हैं। आज के दौर में ये संभव हो सकता हैं। राजनैतिक क्षमता और पूर्वाग्रह को दरकिनार कर हम ऐसा कर सकते हैं। सरहदी जमीनों पर अमन कायम हो सकता हैं आखिर हम सब इसके हक़दार भी हैं। बस आवश्यकता है तो केवल एक सार्थक पहल की।
शांति और दोस्ती के बल पर ही भारत और पाकिस्तान अपनी वैश्विक पहचान बना सकते है तथा तीव्र आर्थिक और सामाजिक विकाश के लक्ष्य को पाने में कामयाब हो सकते हैं। क्या हम हिन्द-पाक के बेहतर आवामी रिश्तों की संभावना को बांग्ला समझौते में तलाश सकते हैं। आज के दौर में ये संभव हो सकता हैं। राजनैतिक क्षमता और पूर्वाग्रह को दरकिनार कर हम ऐसा कर सकते हैं। सरहदी जमीनों पर अमन कायम हो सकता हैं आखिर हम सब इसके हक़दार भी हैं। बस आवश्यकता है तो केवल एक सार्थक पहल की।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें