रविवार, 21 फ़रवरी 2016

संतुलित हो आम बजट

बजट सत्र में आने वाले सोमवार को वित्तमंत्री सरकार का दूसरा पूर्ण आम बजट पेश करेगे. हर बजट की तरह इस बजट पर पुरे देश की नजर है. गाँव से लेकर टेलीविजनों के पर्दों पर बजट के पूर्व ही कयास लगाये जा रहे है कि क्या कुछ वित्तमंत्री की पोटली में होगा जो देश के हर वर्ग के लिए हितों के अनुरुप होगा और लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरेगा? कोर्पोरेट से लेकर ग्रामीण क्षेत्र  को इस बजट से कई उम्मीदे है.  सूखे की मार झेल रहे किसानों के लिए राहत देने का दबाब और बढते सरकारी खर्च को सामान्य बनाये रखना काफी मशक्कत का काम होगा. वन रैंक वन पेंशन के लिए अनुमानित दस हजार करोड़ और सातवें वेतन आयोग को लागू करने में आने वाला करीब एक लाख दस हजार करोड़ का खर्च भी वित्त विभाग को खासा परेशान कर रहा  होगा. ऊची विकास दर को बनाये रखने के लिए विनिवेश को बढावा देने जरुरी है दूसरी तरफ राजकोषीय घाटे के तय लक्ष्य 3.9 को पूरा करने के साथ खर्च में कटौती का भी दबाब रहेगा.
    उघोग जगत कोर्पोरेट कर में छुट चाहता है. सरकार भी मौजूदा कर को 30 फीसदी से घटाकर 25 फीसदी करने का वादा पहले ही कर चुकी है, पर बढते खर्चे को देखते  हुए  करों में रियायत मिलना मुश्किल होगा. एसोचैम भी प्रत्यक्ष करों के दर को 2.50 लाख से बड़कर 4 लाख करने के गुजारिश कर रहा है. सरकार भी करों में सरलीकरण और टैक्स तेर्रिरिस्म (कर आतंकवाद) को समाप्त करने का वादा करती रही है. यानि सरकार के सामने दोहरी चुनौती है कि वो करों में कटौती भी करे और बढते खर्चे का इंतजाम भी करे. इस सब के बीच इस वित्त वर्ष सरकार की कमाई में भी इजाफा हुआ है यानि तेल के दामों (क्रूड आयल) में जारी गिरावट के चलते खजाने की तिजोती भरी गई. वह काफी मददगार होगी साथ ही अप्रत्यक्ष करों में पिछले वित्त वर्ष के तुलना में 37. 6 प्रतिशत की बढोतरी हुई है. अगर अर्थव्यवस्था में सुधार लगातार बना रहता है तो खर्च संतुलन का पूरा किया जा सकता है.
        सरकार पर कोर्पोरेट हित में काम करने और किसानों की अनदेखी करने का आरोप लगता रहा है, काफी हद तक सरकार की नीतिओं से भी इस एहसास को बल मिला है. भूमि अधिग्रहण विधेयक में कोर्पोरेट हित में बदलाब करने और तीन  बार बैक डोर के रास्ते यानि  अध्यादेश लेकर आयी हालाकि अंत में सरकार को झुकना पड़ा और बिल वापस ले लिया गया. पिछले वित्त विधेयक में कोर्पोरेट्स को 42 खरब रूपए यानी  678 अरब अमेरिकी डॉलर की रियायत दी गई थी. दूसरी तरफ सामाजिक योजनाओं में कटौती की गई. स्वास्थ में पिछले बजट में 16  फीसदी और शिक्षा में 20 फीसदी की कटौती की गई. मनरेगा जैसी रोजगारपरक ग्रामीणों के हितार्थ की  योजना में  पिछले बजट से 5000 करोड़ कम आवंटित किये गए. जिसका असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दिखा.  इसलिए वित्तमंत्री अरुण जेटली को इस बार बजट में संतुलन की नीति को आपनाते हुए लोकलुहावन बजट की बजाय एक कल्याणकारी बजट लाना चाहिए, ताकि बाजार में स्थिरता के साथ-साथ आम नागरिकों के लिए भी लाभकारी हो. रोजगार उपलब्ध कराने, सबको बिजली देने और गरीबी को अलविदा करने के लिए तथा  5 करोड़ परिवारों को घर उपलब्ध कराने जैसे वादों को पूरा करने के लिए और समावेशी विकास के लिए सार्वजानिक व्यय में बढोतरी आवश्यक है.
सरकार आपना कुछ ही दिनों बाद अपने कार्यकाल के तीसरा बर्ष में प्रवेश करने वाली है. लेकिन अब तक सरकार के खाते में कोई भी विशेष उपलब्धी हासिल नही की है. बढती महगाई से आम जनता त्रस्त है और अच्छे दिनों का इंतजार जनता आज भी कर ही रही है.  इसलिए सरकार के लिए यह बजट न केवल जनता को किये गए वादों के प्रति  भरोसा दिलाना साथ ही आर्थिक वृद्धि दर को हासिल करना और भारत को सशक्त, मजबूत भारत के निर्माण का भी भरोसा दिलाना होगा.

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

आर्थिक असमानता की खाई

भारत की अर्थव्यवस्था वृद्धि के कुलाचे भर रही है. विश्व में सबसे तेज गति से विकास दर हासिल करने में भारत पहले पायदान पर है. हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था क्रय शक्ति के आधार पर दुनिया की तीसरे और सकल घरेलु उत्पादन में सातवी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है. भारत की पिछले दशक की ग्रोथ रेट 7.7 प्रतिशत रही जो तीव्र वृद्दि दर थी.  आर्थिक नीतिओं अपनाने में भारत ने आजादी के बाद  ने आर्थिक नियोजन पद्दति (यानि रूस का साम्यवादी आर्थिक मॉडल) का अनुसरण किया और सन 1990-91 के बाद अमेरिकी पुजीबाद की तरफ कदम बढाना शुरू किया। जिसके चलते  आर्थिक उदारवाद के बाद हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था ने तरक्की के कई सोपान पुरे किये जो निरंतर जारी है. जिसका आभास हमें बढती विकास दर से कराया जाता है. पर यह अधुरा साचा है. यानि यह सिक्के का एक पहलु है जरा अब हम दुसरे पहलु पर कुछ आकड़ों के जरिहे यह खोजते है कि क्या वास्तव में हमें जो सच्चाई का पाठ पठाया जाता रहा है क्या वो वास्तव में अपनी जिरह में  हकीकत को भी बया करता है या केवल श्ब्ब्दों का लब्बोलुआब भर है. 

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पहला- विश्व बैंक के अनुसार दुनिया की एक तिहाई  गरीब आबादी को बसाये भारत  पहले पायदान पर है. यानि 29.8 प्रतिशत देश की आवाम गरीबी रेखा के नीचे जीवन जीने को मजबूर है जिसका मतलब है कि प्रति व्यक्ति कमाई एक डॉलर से भी कम है. दूसरा- अंतर्राष्ट्रीय खाद्य अनुसंधान संस्थान के अनुसार वैश्विक खाद्य सूचकांक (2012) में भारत की 15.2  प्रतिशत रियाया भुखमरी का शिकार है यानि हर पन्द्रह में से दो लोग मुखो मर रहे है. दुनिया का हर चौथा भूखा  इन्सान भारत में रहता है. तीसरा- संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के मानव विकास सूचकांक की ताजा आंकड़ों में भारत 188 देशों की सूची में 130वें स्थान पर है. यानि स्वस्थ्य जीवन, ज्ञान तक पहुंच और उपयुक्त जीवन स्तर में दीर्घकालीन प्रगति के आकलन में भारत की स्तिथि दयनीय है. यह आकड़े हमें  जमीनी हकीकत  से रूबरू कराते है. जो सब्दबाग हमें दिखाए जा रहे है वो वास्तव में शब्दों की मीठी चसनी भर है. लेकिन आर्थिक विकास  को भी नजरंदाज नही जा सकता यानि आर्थिक विकास तो हुआ पर इसका लाभ भारत के कुछ  अमीरों की जेब में समा गया. अब ऑक्सेम की ताजा रिपोर्ट पर नजर डालते है जिसके के अनुसार भारत की कुल 70 प्रतिशत सम्पति देश के मात्र एक प्रतिशत यानि 2 लाख 36 हजार लोगों के पास है. एक तरफ दुनिया की एक तिहाई आबादी शुद्ध पानी, भोजन और घर जैसी जीवनयापन करने वाली मूलभूत अवश्यकतों से महरूम है. जो विश्व में सर्वाधिक है और दूसरी तरफ फोर्ब्स पत्रिका (2015) में दुनिया के 50 सबसे आमिर देशों की सूचि में अमेरिका, चीन, जर्मनी के बाद  भारत चौथे स्थान पर है. एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 20 सालों में रईसों की सम्पति में 45 प्रतिशत  की वृद्धि हुई दूसरी तरफ गरीबों की आय में 41 प्रितशत की कमी आई. जिस उदारवादी अर्थव्यवथा को गरीबी उन्मूलन और विकास के नाम पर लागु किया गया था . उसकी वास्तविकता यह है कि गरीबी विषबेल की तरह बढती ही जा रही है और  आमिर और आमिर होता जा रहा है. उदारवाद व्यवस्था के फलस्वरूप भारत को विकराल विषमताओं की खाई में बढोतरी ही हुई. यानि एक तरफ तीव्र आर्थिक ब्रद्धि दर हासिल करते रहे और दूसरी तरफ गरीबी कम करने की तमाम कोशिशे काफ़िर ही साबित हुई. OECD (Organisation for economic co-operation  and development) की रिपोर्ट के अनुसार 1990 में भारत की उच्च आय वाली 10 फीसदी आबादी निम्न आय वाली 10 फसदी आबादी में तुलना में 6 फीसदी ज्यादा थी जो 2011 में बढकर 12 फीसदी हो गई.

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 एक तरफ दुनिया का नेतृत्व करने की महत्वाकांक्षा यानि विश्व गुरु बनने की इच्छा और दूसरी तरफ बड़ी आबादी आसमान के नीचे भूखे पेट सोने को मजबूर है. अब सवाल खड़ा होता है कि धर्म, जाती और संप्रदाय के नाम पर हंगामा करने वाली राजनितिक पार्टिया, विचारधारों के लिए आपस में लड़ने वाले कथित बुद्धजीवी  लोग इन विषम परिस्थितिओं को लेकर कोई हंगामा क्यूँ नही करते है. आखिर क्यों धर्म और जाती की जगह भूख चर्चा का विषय नही हो सकती है. क्यूं अमीरी - गरीबी की खाई को पाटने के लिए टीवी पर डिवेट नही होती है. यह अनदेखी केवल यही लोग नही करते जो देश का नेतृत्व करते है. बल्कि  स्वंय रियाया क्यों इस मुफलिसी को अपना भाग्य मन  बैठी है.  क्यूं वो अपने अधिकार पाने के लिए विद्रोह नही करती है. कहा जाता है कि  भारत के लोग दर्शन के आधार पर बड़ी से बड़ी समस्या को सह जाते है. पर हमें यह नही भूलना चाहिए सभ्य समाज में समानता का अधिकार ही लोकतंत्र का आधार स्तम्भ है इसके बिना मजबूत लोकतंत्र की कल्पना करना बेमानी है.