बजट सत्र में आने वाले सोमवार को वित्तमंत्री सरकार का दूसरा पूर्ण आम बजट पेश करेगे. हर बजट की तरह इस बजट पर पुरे देश की नजर है. गाँव से लेकर टेलीविजनों के पर्दों पर बजट के पूर्व ही कयास लगाये जा रहे है कि क्या कुछ वित्तमंत्री की पोटली में होगा जो देश के हर वर्ग के लिए हितों के अनुरुप होगा और लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरेगा? कोर्पोरेट से लेकर ग्रामीण क्षेत्र को इस बजट से कई उम्मीदे है. सूखे की मार झेल रहे किसानों के लिए राहत देने का दबाब और बढते सरकारी खर्च को सामान्य बनाये रखना काफी मशक्कत का काम होगा. वन रैंक वन पेंशन के लिए अनुमानित दस हजार करोड़ और सातवें वेतन आयोग को लागू करने में आने वाला करीब एक लाख दस हजार करोड़ का खर्च भी वित्त विभाग को खासा परेशान कर रहा होगा. ऊची विकास दर को बनाये रखने के लिए विनिवेश को बढावा देने जरुरी है दूसरी तरफ राजकोषीय घाटे के तय लक्ष्य 3.9 को पूरा करने के साथ खर्च में कटौती का भी दबाब रहेगा.
उघोग जगत कोर्पोरेट कर में छुट चाहता है. सरकार भी मौजूदा कर को 30 फीसदी से घटाकर 25 फीसदी करने का वादा पहले ही कर चुकी है, पर बढते खर्चे को देखते हुए करों में रियायत मिलना मुश्किल होगा. एसोचैम भी प्रत्यक्ष करों के दर को 2.50 लाख से बड़कर 4 लाख करने के गुजारिश कर रहा है. सरकार भी करों में सरलीकरण और टैक्स तेर्रिरिस्म (कर आतंकवाद) को समाप्त करने का वादा करती रही है. यानि सरकार के सामने दोहरी चुनौती है कि वो करों में कटौती भी करे और बढते खर्चे का इंतजाम भी करे. इस सब के बीच इस वित्त वर्ष सरकार की कमाई में भी इजाफा हुआ है यानि तेल के दामों (क्रूड आयल) में जारी गिरावट के चलते खजाने की तिजोती भरी गई. वह काफी मददगार होगी साथ ही अप्रत्यक्ष करों में पिछले वित्त वर्ष के तुलना में 37. 6 प्रतिशत की बढोतरी हुई है. अगर अर्थव्यवस्था में सुधार लगातार बना रहता है तो खर्च संतुलन का पूरा किया जा सकता है.
सरकार पर कोर्पोरेट हित में काम करने और किसानों की अनदेखी करने का आरोप लगता रहा है, काफी हद तक सरकार की नीतिओं से भी इस एहसास को बल मिला है. भूमि अधिग्रहण विधेयक में कोर्पोरेट हित में बदलाब करने और तीन बार बैक डोर के रास्ते यानि अध्यादेश लेकर आयी हालाकि अंत में सरकार को झुकना पड़ा और बिल वापस ले लिया गया. पिछले वित्त विधेयक में कोर्पोरेट्स को 42 खरब रूपए यानी 678 अरब अमेरिकी डॉलर की रियायत दी गई थी. दूसरी तरफ सामाजिक योजनाओं में कटौती की गई. स्वास्थ में पिछले बजट में 16 फीसदी और शिक्षा में 20 फीसदी की कटौती की गई. मनरेगा जैसी रोजगारपरक ग्रामीणों के हितार्थ की योजना में पिछले बजट से 5000 करोड़ कम आवंटित किये गए. जिसका असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दिखा. इसलिए वित्तमंत्री अरुण जेटली को इस बार बजट में संतुलन की नीति को आपनाते हुए लोकलुहावन बजट की बजाय एक कल्याणकारी बजट लाना चाहिए, ताकि बाजार में स्थिरता के साथ-साथ आम नागरिकों के लिए भी लाभकारी हो. रोजगार उपलब्ध कराने, सबको बिजली देने और गरीबी को अलविदा करने के लिए तथा 5 करोड़ परिवारों को घर उपलब्ध कराने जैसे वादों को पूरा करने के लिए और समावेशी विकास के लिए सार्वजानिक व्यय में बढोतरी आवश्यक है.
सरकार आपना कुछ ही दिनों बाद अपने कार्यकाल के तीसरा बर्ष में प्रवेश करने वाली है. लेकिन अब तक सरकार के खाते में कोई भी विशेष उपलब्धी हासिल नही की है. बढती महगाई से आम जनता त्रस्त है और अच्छे दिनों का इंतजार जनता आज भी कर ही रही है. इसलिए सरकार के लिए यह बजट न केवल जनता को किये गए वादों के प्रति भरोसा दिलाना साथ ही आर्थिक वृद्धि दर को हासिल करना और भारत को सशक्त, मजबूत भारत के निर्माण का भी भरोसा दिलाना होगा.
उघोग जगत कोर्पोरेट कर में छुट चाहता है. सरकार भी मौजूदा कर को 30 फीसदी से घटाकर 25 फीसदी करने का वादा पहले ही कर चुकी है, पर बढते खर्चे को देखते हुए करों में रियायत मिलना मुश्किल होगा. एसोचैम भी प्रत्यक्ष करों के दर को 2.50 लाख से बड़कर 4 लाख करने के गुजारिश कर रहा है. सरकार भी करों में सरलीकरण और टैक्स तेर्रिरिस्म (कर आतंकवाद) को समाप्त करने का वादा करती रही है. यानि सरकार के सामने दोहरी चुनौती है कि वो करों में कटौती भी करे और बढते खर्चे का इंतजाम भी करे. इस सब के बीच इस वित्त वर्ष सरकार की कमाई में भी इजाफा हुआ है यानि तेल के दामों (क्रूड आयल) में जारी गिरावट के चलते खजाने की तिजोती भरी गई. वह काफी मददगार होगी साथ ही अप्रत्यक्ष करों में पिछले वित्त वर्ष के तुलना में 37. 6 प्रतिशत की बढोतरी हुई है. अगर अर्थव्यवस्था में सुधार लगातार बना रहता है तो खर्च संतुलन का पूरा किया जा सकता है.
सरकार पर कोर्पोरेट हित में काम करने और किसानों की अनदेखी करने का आरोप लगता रहा है, काफी हद तक सरकार की नीतिओं से भी इस एहसास को बल मिला है. भूमि अधिग्रहण विधेयक में कोर्पोरेट हित में बदलाब करने और तीन बार बैक डोर के रास्ते यानि अध्यादेश लेकर आयी हालाकि अंत में सरकार को झुकना पड़ा और बिल वापस ले लिया गया. पिछले वित्त विधेयक में कोर्पोरेट्स को 42 खरब रूपए यानी 678 अरब अमेरिकी डॉलर की रियायत दी गई थी. दूसरी तरफ सामाजिक योजनाओं में कटौती की गई. स्वास्थ में पिछले बजट में 16 फीसदी और शिक्षा में 20 फीसदी की कटौती की गई. मनरेगा जैसी रोजगारपरक ग्रामीणों के हितार्थ की योजना में पिछले बजट से 5000 करोड़ कम आवंटित किये गए. जिसका असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दिखा. इसलिए वित्तमंत्री अरुण जेटली को इस बार बजट में संतुलन की नीति को आपनाते हुए लोकलुहावन बजट की बजाय एक कल्याणकारी बजट लाना चाहिए, ताकि बाजार में स्थिरता के साथ-साथ आम नागरिकों के लिए भी लाभकारी हो. रोजगार उपलब्ध कराने, सबको बिजली देने और गरीबी को अलविदा करने के लिए तथा 5 करोड़ परिवारों को घर उपलब्ध कराने जैसे वादों को पूरा करने के लिए और समावेशी विकास के लिए सार्वजानिक व्यय में बढोतरी आवश्यक है.
सरकार आपना कुछ ही दिनों बाद अपने कार्यकाल के तीसरा बर्ष में प्रवेश करने वाली है. लेकिन अब तक सरकार के खाते में कोई भी विशेष उपलब्धी हासिल नही की है. बढती महगाई से आम जनता त्रस्त है और अच्छे दिनों का इंतजार जनता आज भी कर ही रही है. इसलिए सरकार के लिए यह बजट न केवल जनता को किये गए वादों के प्रति भरोसा दिलाना साथ ही आर्थिक वृद्धि दर को हासिल करना और भारत को सशक्त, मजबूत भारत के निर्माण का भी भरोसा दिलाना होगा.




