भूमंडलीकरण के शाब्दिक अर्थ को सबजन सुखाय और बासुदेव कुटुंब्कम के साथ जोड़ा जाता हैं। इसको ऐसे परिभाषित किया जाता है मानो भूमंडलीकरण का सूत्रपात हर व्यक्ति को सहयोग और सुख देने के लिए हुआ हैं। पर वास्तविक स्तिथि इसके ठीक उलट हैं। एडम स्मिथ के विश्व व्यापार सिद्धांत से लेकर ब्रेटनवुड प्रणाली पर आधारित विश्व व्यापर पद्दति में कही भी सबजन हिताय सबजन सुखाय का जिक्र तक नही होता और न ही ऐसा देखने को मिलता है कि भूमंडलीकरण से किसी देश की आर्थिक सामाजिक स्थिति में बदलाब आया हो। वास्तव में ये भ्रम हमारे दिमाग में पैठा दिया गया कि दुनिया के विकाश के लिए भूमंडलीकरण का जन्म हुआ लेकिन सत्यता ठीक इसके उलट हैं। विश्व की वर्तमान स्थिति के अनुसार विश्व की 70 प्रतिशत आबादी अविकशित क्षेत्रों में निवास करती हैं। विश्व की 70 प्रतिशत लोग दो डॉलर से कम पर गुजरा कर रहे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार 2011 में निर्धनतम देश 1980 के मुकाबले ज्यादा गरीब हो गए। इन देशों का धन चुनिंदा पूजीपतिओं की जेबों में समा गया। आक्सेफैम (अंतरराष्ट्रीय एजेंसी) के रिपोर्ट अनुसार 8 वर्षो में विश्व की 51 प्रतिशत पूंजी 1 प्रतिशत लोगों के हाथो में पहुंच जाएगी जो 2009 में 48 प्रतिशत थी। इसका एक करण तो यह रहा कि पश्चिमी विकशित मॉडल की चाह में इन देशों ने विकशित देशों से कर्ज लिया और विकास के स्वर्णमृग का पीछा करते ये इस स्थिति तक आ गये कि अब बिना विदेशी पूँजी के अपने देश की अर्थव्यवस्ता तक नही चला सकते। भारत के यूपीए सरकार के बित्त मंत्री पि. चिदंबरम ने 2012 में संसद में बजट पेश करते हुए ये चिंता जाहिर की थी कि "भुगतान शेष में भरी कमी के चलते विदेशी मुद्रा की कमी के कारण विदेशी निवेश और विदेशी ऋण मज़बूरी बन चूका हैं।" दुसरी वजह यह है की भूमंडलीकरण मुद्रा प्रवाह में आने वाली रुकावटों को तो दूर करता हैं। पर मनुष्य को सरहदी दीवारों में बांध कर रखना चाहता हैं। लोगों को बाजार के जरीहे तो जोड़ना चाहता है सामाजिक स्तर पर नही। आधुनिक युग में 'दुनिया एक गांव है' तो वह एक खूबसूरत जगह हो सकती थी विषमताए तो गांव में भी होती हैं। लेकिन अपनापन भी होता हैं। लोग कहि भी आने जाने के लिए स्वतंत्र होते, हाल तक इतिहास में लोग अकाल पड़ने, अधिक अत्याचार या युद्ध की स्तिथि ने निपटने के लिए लोग पुराने इलाके छोड़कर नई जगहों पर बस जाते थे। ऐसी तरह लोक एक इलाके से दूसरे इलाको में आव्रजन करते थे। भारत में शक ,हुण और कुषाण और कई धुमंतू जातियां आई। यहुदी और पारसी भी इस्लाम के अत्याचार से बचने का लिए भारत आये। अमेरिका और भारत की खोज भी समृद्धि की खोज का हिस्सा थी। लेकिन जब यूरोपीय राष्ट्रों ने विश्व के समृद्धि भूखंडों पर कब्जा कर लिया तो जान समुदाओं के आव्रजन पर पाबंदी लगा दी। दिलचस्प तो यह है कि जब सस्ते श्रम की आवश्यकता होती है तो उनका ये दर्शन बदल जाता है। भूमंडलीकरण का मुख्य उद्देश्य लाभ अर्जित करना हैं। सस्ते श्रम का लाभ, प्राकतिक संसाधनों का दोहन कर उपभोग संस्कृती को बढ़वा देना। दृतीय विश्व युद्ध के बाद जो अर्थव्यवस्थाएं कड़ी हुई वो आज भी जीवंत हैं। पर इन 70 सालों में विश्व के शाक्तिशाली संगठन जी7 में कोई अन्य देश क्यों नही जुड़ पाया। जी8, जी9 या जी10 क्यों नही बन पाया? फिर भूमंडलीकरण के पैरोकार पश्चिमी देशों से कैसे अविकसित देशों में सुधार की उम्मीद की जा सकती है। सत्यता यही है कि भूमंडलीकरण के बाद इन देशों को आर्थिक शोषण तो हुआ ही साथही अविवाहित मातृत्व , नस्लवाद, नशे की लत, अधकचरा आधुनिकीकरण, और भ्रष्टाचार ने तीसरी दुनिया को अपने ग्रास में ले लिया और विश्व युद्धों की हिंसा में झोक दिया।
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