भारत की अर्थव्यवस्था
वृद्धि के कुलाचे भर रही है. विश्व में सबसे तेज गति से विकास दर हासिल करने में
भारत पहले पायदान पर है. हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था क्रय शक्ति के आधार पर दुनिया
की तीसरे और सकल घरेलु उत्पादन में सातवी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है. भारत
की पिछले दशक की ग्रोथ रेट 7.7 प्रतिशत रही जो तीव्र वृद्दि दर थी. आर्थिक नीतिओं अपनाने में भारत ने आजादी के बाद
ने आर्थिक नियोजन पद्दति (यानि रूस का साम्यवादी आर्थिक मॉडल) का अनुसरण
किया और सन 1990-91 के बाद अमेरिकी पुजीबाद की तरफ कदम बढाना
शुरू किया। जिसके चलते आर्थिक उदारवाद के बाद हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था
ने तरक्की के कई सोपान पुरे किये जो निरंतर जारी है. जिसका आभास हमें बढती विकास
दर से कराया जाता है. पर यह अधुरा साचा है. यानि यह सिक्के का एक पहलु है जरा अब
हम दुसरे पहलु पर कुछ आकड़ों के जरिहे यह खोजते है कि क्या वास्तव में हमें जो
सच्चाई का पाठ पठाया जाता रहा है क्या वो वास्तव में अपनी जिरह में हकीकत को
भी बया करता है या केवल श्ब्ब्दों का लब्बोलुआब भर है.
पहला- विश्व बैंक के
अनुसार दुनिया की एक तिहाई गरीब आबादी को बसाये भारत पहले पायदान पर है. यानि 29.8 प्रतिशत देश की आवाम गरीबी रेखा के नीचे जीवन जीने को मजबूर है जिसका मतलब है कि
प्रति व्यक्ति कमाई एक डॉलर से भी कम है. दूसरा- अंतर्राष्ट्रीय खाद्य अनुसंधान
संस्थान के अनुसार वैश्विक खाद्य सूचकांक (2012) में भारत की
15.2 प्रतिशत रियाया भुखमरी का शिकार है यानि हर
पन्द्रह में से दो लोग मुखो मर रहे है. दुनिया का हर चौथा भूखा इन्सान भारत
में रहता है. तीसरा- संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के मानव विकास
सूचकांक की ताजा आंकड़ों में भारत 188 देशों की सूची में 130वें स्थान पर है. यानि स्वस्थ्य जीवन, ज्ञान तक पहुंच और उपयुक्त जीवन स्तर में दीर्घकालीन प्रगति के आकलन में
भारत की स्तिथि दयनीय है. यह आकड़े हमें
जमीनी हकीकत से रूबरू कराते है. जो सब्दबाग हमें दिखाए जा रहे है वो
वास्तव में शब्दों की मीठी चसनी भर है. लेकिन आर्थिक विकास को भी नजरंदाज
नही जा सकता यानि आर्थिक विकास तो हुआ पर इसका लाभ भारत के कुछ अमीरों की
जेब में समा गया. अब ऑक्सेम की ताजा रिपोर्ट पर नजर डालते है जिसके के अनुसार भारत
की कुल 70 प्रतिशत सम्पति देश के मात्र एक प्रतिशत यानि 2
लाख 36 हजार लोगों के पास है. एक तरफ दुनिया
की एक तिहाई आबादी शुद्ध पानी, भोजन और घर जैसी जीवनयापन
करने वाली मूलभूत अवश्यकतों से महरूम है. जो विश्व में सर्वाधिक है और दूसरी तरफ
फोर्ब्स पत्रिका (2015) में दुनिया के 50 सबसे आमिर देशों की सूचि में अमेरिका, चीन, जर्मनी के बाद भारत चौथे स्थान पर है. एक रिपोर्ट के अनुसार भारत
में लगभग 20 सालों में रईसों की सम्पति में 45 प्रतिशत की वृद्धि हुई दूसरी तरफ गरीबों की आय में 41 प्रितशत की कमी आई. जिस उदारवादी अर्थव्यवथा को गरीबी उन्मूलन और विकास के
नाम पर लागु किया गया था . उसकी वास्तविकता यह है कि गरीबी विषबेल की तरह बढती ही
जा रही है और आमिर और आमिर होता जा रहा है. उदारवाद व्यवस्था के फलस्वरूप
भारत को विकराल विषमताओं की खाई में बढोतरी ही हुई. यानि एक तरफ तीव्र आर्थिक ब्रद्धि
दर हासिल करते रहे और दूसरी तरफ गरीबी कम करने की तमाम कोशिशे काफ़िर ही साबित हुई.
OECD (Organisation for economic co-operation and development) की रिपोर्ट के अनुसार 1990 में भारत की उच्च आय वाली
10 फीसदी आबादी निम्न आय वाली 10 फसदी
आबादी में तुलना में 6 फीसदी ज्यादा थी जो 2011 में बढकर 12 फीसदी हो गई.
एक
तरफ दुनिया का नेतृत्व करने की महत्वाकांक्षा यानि विश्व गुरु बनने की इच्छा और
दूसरी तरफ बड़ी आबादी आसमान के नीचे भूखे पेट सोने को मजबूर है. अब सवाल खड़ा होता
है कि धर्म, जाती और संप्रदाय के नाम पर हंगामा करने वाली
राजनितिक पार्टिया, विचारधारों के लिए आपस में लड़ने वाले
कथित बुद्धजीवी लोग इन विषम परिस्थितिओं को लेकर कोई हंगामा क्यूँ नही करते
है. आखिर क्यों धर्म और जाती की जगह भूख चर्चा का विषय नही हो सकती है. क्यूं
अमीरी - गरीबी की खाई को पाटने के लिए टीवी पर डिवेट नही होती है. यह अनदेखी केवल
यही लोग नही करते जो देश का नेतृत्व करते है. बल्कि स्वंय रियाया क्यों इस
मुफलिसी को अपना भाग्य मन बैठी है. क्यूं वो अपने अधिकार पाने के लिए
विद्रोह नही करती है. कहा जाता है कि भारत के लोग दर्शन के आधार पर बड़ी से
बड़ी समस्या को सह जाते है. पर हमें यह नही भूलना चाहिए सभ्य समाज में समानता का
अधिकार ही लोकतंत्र का आधार स्तम्भ है इसके बिना मजबूत लोकतंत्र की कल्पना
करना बेमानी है.


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