अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधानिक अधिकार है। जिसका उद्देश्य व्यक्ति को अपने विचारों को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता देना है जो व्यक्ति को प्रकृति ने प्रदान किया है। मानवीय गरिमा पूर्ण जीवन जीने और आपने व्यक्तित्व के विकास के लिए अविव्यक्ति की स्वतंत्रताका का होने आवश्यक है। हम सभी का ये कर्त्तव्य है कि हम इस अधिकार का सम्मान करें। फ्रांस के महान दार्शनिक वाल्तेयर ने अभीव्यक्ति की स्वतंत्रा के प्रति आपने विचार प्रकट करते हुए कहा था कि “हो सकता है मैं आपके विचारो से सहमत न हो पाऊ फिर भी विचार प्रकट करने के आपके अधिकारों की रक्षा करूँगा।"
हमें हर व्यक्ति के विचारों और हर तरह के विचारों का सम्मान करना ही चाहिए। यह हमारा कर्तव्य भी है। व्यक्ति का मूल उद्देश्य आपने व्यक्तित्व का सर्वागींण विकास करना है और यह स्वतंत्रा के उन्मुक्त वातावरण में ही संभव है। इसलिए मेरे विचार से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रा का अर्थ है स्वयं अपनी मनुष्यता को बढ़ाते हुए दूसरों को मनुष्य बनाना। यह एक आदर्श है। आध्यात्मिक साहित्य- वेदों और उपनिषदों का ज्ञान भी विचारों का ही संकलन है जो वाद विवादों के द्वारा ही एकत्रित हुए है इसलिए विचारों पर सीमितता की सीमारेखा खीचना विचारों की हत्या करना है जो अच्छे समाज और परिवर्तनशील प्रकृति के विपरीत है।
भारत की परंपरा रही है कि यहां विरोद्धी विचारों को भी सम्मान पूर्वक ग्रहण किया जाता है। वेदों के दिव्य ज्ञान के साथ साथ चार्वाक के वेद विरोद्धी लोकायत को भी इस समाज ने दर्शन का स्थान दिया। भारत की विविधता में एकता का सूत्र यही है। भारत ही वो पावनभूमि है जहां हर धर्म और भिन्न विचार रखने वाले लोग एकसाथ मिलझुल कर रहते है। हर तरह के विचारों का सम्मान यहां किया जाता है। यह सर्वविदित है कि जब विचारों पर अंकुश लगाया जाता तो जिस तरह रुके हुए तालाब का पानी बदबू देने लगता है वह पीने योग्य नही रहता उसी तरह नए विचार का जन्म ना लेना व्यक्ति को रूढ़िवादी बना देता है। जिसका परिणाम हम मध्य एशिया में मचे रक्तपात से लगा सकते है। जहां इस्लामिक स्टेट आपने विरोद्धी विचार रखने वालों को कैसे बड़ी निर्ममता से मार रहा है। एक प्रगतिशील समाज में विचारों की अभीव्यक्ति की सीमितता का कोई स्थान नही हो सकता। एक स्वस्थ लोकतंत्र और समानता के विकास के लिए नए नए विचारों का जन्म लेना अनिवार्य है विचार आयेंगे तभी समाधान निकले जायेंगे और हम नए समाज का निर्माण कर सकेंगे।
फ्रांस की क्रांति के अग्रदूत रूसो ने कहा था कि मनुष्य स्वत्रंत पैदा हुआ है पर वह सर्वत्र जंजीरों में जकड़ा हुआ है। इन जंजीरों को तोडना ही मनुष्य ध्येय है और विचारों के द्वारा ही यह सम्भव है। जब इन विचारों पर रोक लगाई जाती है तो क्रन्ति होती है। ट्यूनिसिया और मिस्र की 2011 की क्रांति इसी अभियक्ति की स्वतंत्रा का परिणाम था। जहां लोगों ने क्रूर तानाशाही की जगह लोकतंत्र को चुना जिसका आधार ही विचारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। इसलिए हम जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के निवासी है विचारों की सिमित रखने का विचार भी नही लाना चाहिए। विचारों को सिमित करने या रखने की वजाह विचारों के सही मार्ग को खोजना चाहिए। महर्षि अरविंद ने विचारों की महत्ता को समझते हुए कहा था कि यदि भारत को अपना अस्तित्व वनाये रखना है और विश्व में अपना स्थान निर्धारित करना है तो हमारी पीढ़ी को तो हमारी पहली आवश्यकता होगी कि हम विचार करना सीखे, सभी विषयों पर विचार करना लाभदायक ढंग से, वस्तुओं के तह तक जाकर पूर्व निर्णयों से मुक्त होकर, एक तेज तलवार से मिथ्याभ्यास और पूर्वाग्रह को काटते हुए हर प्रकार की रूढ़िवादिता को मानो भीम की गदा के प्रहार से चूर कर दे।
इसी प्रकार विवेकानन्द कहां करते थे कि व्यक्ति के चरित्र का निर्माण बालू की रेट पर नही होता इसके लिए विचारों की आवश्यकता होती है। इसलिए चरित्र निर्माण के लिए विचारों का स्वतंत्र होना अनिवार्य है। लेकिन कुछ समय से विचारों को पैदा होने से रोका जा रहा है। अग्रेजों की गुलामी ने हमारे विचारों को ही नष्ट नही किया बल्कि हमारी वैचारिक चेतना का भी दमन किया था। जिसका असर आज भी हमारी मानसिकता से इंगित होता है। विचारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से केवल अंग्रेज ही नही हमारी अपनी सरकारें भी अपने अनैतिक कार्यों को छुपाने के लिए सबसे पहले विचारों की अभिव्यक्ति पर ही रोक लगती है। याद कीजिये 1975 से 1977 के दिन जब देश में आपातकाल लगया गया। जब नागरिक स्वतंत्रतों और जनवादी अधिकारों को हनन किया गया और जब इसका विरोध किया गया तो लोगों की विचार प्रकटीकरण के अधिकार यानी मिडिया पर भी सेंसरशिप लगा दी गई। उन्हें विरोध करने के अधिकार से वंचित किया गया।
कुछ लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अपनी जागीर समझते है। जो हमारे धर्म का, हमारी जाति का, हमारी पार्टी का न हो उसे अपने शत्रु की तरह देखते है। इसकी भयानकता और बढ़ती जाती है। जिसकी परिणति हम रोज घृणा, हिंसा, आतंकवाद, बर्बरता और असहिष्णुता आदि के रूप में नित रोज देख रहे है। इसलिए हमें विचारों को सिमित करने की वजाह विचारों के शुद्धिकरण पर ध्यान देना होगा, ताकि हम एक स्वस्थ लोकतंत्र का निर्माण कर सके और बेहतर दुनिया बना सके। ऐसी बात बोलना, जिससे बोलने वाले व्यक्ति की मनुष्यता व्यक्त होती हो, उससे साथ साथ जिसमें दुनिया के सभी मनुष्यो का कल्याण भी निहित हो। ‛य एषु सुप्तेषु जागर्ति' अर्थात इस संसार के सभी मनुष्य जागे इस उद्देश्य के साथ हमारे विचारों को जन्म हो और उन पर किसी भी प्रकार की कोई सीमितता की जंजीरे ना लगाई जाये।