हमारे शब्दों में हमारे विचारों की अभिव्यक्ति होती हैं। चिंतन के गर्भ से उत्पन्न विचार हमारी मानसिकता को इंगित करते हैं। यघपि ये विचार हमारी शिक्षा तथा अनुभव की नींव पर जन्म लेते हैं 'यथा शिक्षा तथा विचार' यानी जैसी शिक्षा वैसे विचार। विचारों की महत्ता को रेखाकिंत करते हुए महर्षि अरविन्द ने कहा था कि "यदि भारत को अपना अस्तित्व बनाए रखना है और विश्व में अपना स्थान निर्धारित करना है तो हमारी पहली आवश्यकता होगी कि भारत का युवा विचार करना सीखे, सभी विषयों पर विचार करना स्वतंत्र रूप से ; लाभदायक ढंक से , वस्तुओं की तह तक जाकर पूर्ण निर्णयो से मुक्त होकर, एक तेज तलवार से मिध्याभ्यास और पूर्वाग्रह को काटते हुए, हर प्रकार की रूढ़िवादिता को मनो भीम की गादा के प्रहार सर चूर करते हुए....।" तघपि जब वर्तमान परिपेक्ष्य में शिक्षा आदर्श और यथार्थ से निकालकर प्रयोजनवादी हो जाए, जहां शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार सृजन करने तक सीमित हो जाता है, तब वैचारिक चिंतन का ह्रास होकर युवा प्रतिस्पर्धा के युग में प्रवेश करता हैं। जहां नैतिक मूल्यहीनता, सामाजिक विघटन, मानसिक तनाव जैसी कई विसंगतिओं का जन्म होता हैं। प्रतिस्पर्धा के आवेश में हम उचित अनुचित के बोध को समझने में असमर्थ हो जाते है और जन्म लेती है में और तुम की भावना। तब हम स्वयं को श्रेष्ठ समझते और दूसरों का तिरस्कार करते हैं। उसकी कमियों को खोजते है और खुश होते हैं। इन सब के बीच शिक्षा का मूल्य उद्देश्य मानवीय एकता , दयाभाव , सेवा, शिष्टता, आत्मिक उन्नति, संस्कृति और सभ्यता के प्रति लगाव जैसे पहलु काफी पीछे छूट जाते हैं। और सच होती है लार्ड मैकाले की 1832 में की गई भविष्यवाणी जो उसने ब्रटिश संसद में की थी कि भारत की आने वाली पीढ़ी शारीर से तो भारतीय होगी पर मानसिक रुप से अंग्रेजी होगी। उसी की बनाई शिक्षा निति का अनुसरण हम आजादी के बाद भी सिद्दत से करते आ रहे हैं। रही कसर शिक्षा का निजीकरण और बाजारीकरण कर भारतीय निति निर्माताओं ने पूरी कर दी। सरकारी और प्राइवेट स्कूलों के भीच की खाई इतनी बढ़ती जा रही है कि आने वाली पीढ़ी के मन में एक दुसरे के प्रति वैमनस्यता के साथ साथ सामाजिक स्तरीकरण भी बढता जा रहा हैं। आज बढ़ते अपराधों का कारण भी हमारी शिक्षा ही हैं। वर्तमान शिक्षा प्रणाली कोई मनुष्यत गुण उतपन्न नही करती। तत्व रहित शिक्षा जिसे स्वामी विवेकानंद 'निषेधात्मक शिक्षा' कहते हैं। एक अभावात्मक शिक्षा जो व्यक्ति की मौलिकता को कुण्ठित कर देती हैं। इसलिए शिक्षा ऐसी हो जो आज की पीढ़ी के पुरुषार्थ को सबल बनाये, उनके चरित्र और बुद्धि का विकास करें। युवा अपने लक्ष्य को पाने में समर्थ बन सके। तभी हम अपने देश को परम वैभव अर्थात सर्वांगीण उन्नति के पथ पर आधारित, विश्वमानवता के कल्याण के लिए भौतिक और अध्यत्मिक उन्नति को सुनिश्चित कर सकेगे।
सोमवार, 18 मई 2015
सार्थक पहल
41 साल पहले इंदिरा और बांग्लादेश के मजीबुर्रहमान के बीच हुये सीमा समझौते को अमलीजामा पहनाकर भारतीय राजनीति ने ये साबित कर दिया की वो राष्ट्र से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दो पर आम राय रखते है जो अमूमन नजर नही आती। साथही भारत हर विवादास्पद मुद्दों का वार्तालाप और आपसी समझौते के जरिये सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध है। बाग्लादेश और भारत के भीच हुए इस समझौते की तरह क्या भारत पाकिस्तान सीमा विवाद का रास्ता खोजा जा सकता है? अगर ये मुमकिन हो जाता है तो इतिहास के पन्नों में ये सदी स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज की जायेगी।सीमा विवाद के खत्म होते ही पूरा दक्षिण एशिया में शांति और सामरिक सहयोग से सबसे समृद्धशाली और शक्तिशाली बनकर उभर सकता हैं। भारत -पाक के हुक्मरानों को जल्द से जल्द इस विवाद को खत्म करने की पहल पर आगे बढ़ना चाहिए तभी हम अपनी आवामों को 21 वी सदी की जरूरतों के अनुरूप तैयार कर उन्हें उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने में समर्थवान बना सकते हैं।
शांति और दोस्ती के बल पर ही भारत और पाकिस्तान अपनी वैश्विक पहचान बना सकते है तथा तीव्र आर्थिक और सामाजिक विकाश के लक्ष्य को पाने में कामयाब हो सकते हैं। क्या हम हिन्द-पाक के बेहतर आवामी रिश्तों की संभावना को बांग्ला समझौते में तलाश सकते हैं। आज के दौर में ये संभव हो सकता हैं। राजनैतिक क्षमता और पूर्वाग्रह को दरकिनार कर हम ऐसा कर सकते हैं। सरहदी जमीनों पर अमन कायम हो सकता हैं आखिर हम सब इसके हक़दार भी हैं। बस आवश्यकता है तो केवल एक सार्थक पहल की।
शांति और दोस्ती के बल पर ही भारत और पाकिस्तान अपनी वैश्विक पहचान बना सकते है तथा तीव्र आर्थिक और सामाजिक विकाश के लक्ष्य को पाने में कामयाब हो सकते हैं। क्या हम हिन्द-पाक के बेहतर आवामी रिश्तों की संभावना को बांग्ला समझौते में तलाश सकते हैं। आज के दौर में ये संभव हो सकता हैं। राजनैतिक क्षमता और पूर्वाग्रह को दरकिनार कर हम ऐसा कर सकते हैं। सरहदी जमीनों पर अमन कायम हो सकता हैं आखिर हम सब इसके हक़दार भी हैं। बस आवश्यकता है तो केवल एक सार्थक पहल की।
गुरुवार, 14 मई 2015
राहुल से उम्मीद
2004 में भारतीय राजनीति में जब राहुल गांधी का प्रवेश हुआ, तो चर्चाओ के बाजार में इन्हें भविष्य का नेता माना जा रहा था। बड़े जोशोखरोश के साथ इनका स्वागत हुआ। खबरिया चैनलों में राहुल की हर हरकत पर तीखी नजर रहती थी। गांव में रात बिताने, मच्छर के काटने और गरीब के घर रोटी खाने तक की खबरों को मीडिया में प्रमुखता से कवर किया जा रहा था। अपनी लोगप्रियता की चरमसीमा पर थे राहुल। जिसे 2009 के लोकसभा चुनाव की जीत ने साबित भी कर दिया की वास्तव में वो आने वाले समय के बड़े नेता हैं। लेकिन धीरे धीरे ये तिलिस्म मद होता गया। लेकिन 2014 की हार के बाद एक बार फिर राहुल की आक्रमकता लोट आई सी लगती हैं। संसद से लेकर सड़क तक वो सरकार को घेरते नजर आ रहे हैं। उनके बयानों पर राजनैतिक गलियारों में गर्माहट आ गई है जो कुछ दिनों से नदारद थी। राहुल का कायाकल्प भी ठीक समय पर हुआ जब पार्टी को उनकी बेहद जरुरत हैं। कॉग्रेस अपनी खोई जमीन को पाने के लिए राहुल की सक्रियता पर ही निर्भर करती हैं। कॉग्रेस के लिए राहुल ही वो एकलौते चहेरा हैं जिसके बल पर वो मुख्य धारा मे अपनी वापसी की उम्मीद कर सकती हैं। मैजूदा राजनितिक हालातो के चलते ने उन्हें ये मौका भी मिल गया जिसे उन्होंने बिना देरी किये भुना लिया। राहुल किसी भी मुद्दे पर मोदी सरकार को घेरने का मौका नही छोड़ते। सूट - बूट पर दिए बयान से लेकर वो लगातार सरकार पर कॉर्पोरेट परस्ती का आरोप लगा रहे है जिनमें उनकी आक्रमकता झलक रही हैं। सड़क से लेकर संसद तक भूमि अधिग्रहण बिल के जरीये वो कॉग्रेस को किसानहितैषी और सरकार को किसानबिरोधी बता रहे हैं। रेल में सफर कर आम आदमी से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं। इन सब में राहुल कितने कामयाब होते है ये तो आने वाल वक्त ही बताएगा। पर राहुल ने अलग थलग पड़े विपक्ष और कॉग्रेस मुर्दे में नई जान जरूर डाल दी हैं।
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