सोमवार, 20 अप्रैल 2015

कैसा विकास

आजादी के बाद भारतीय समाज में  राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से  कई महत्वपूर्ण बदलाबों का दौर चला जो अनवरत जारी हैं। पर ये बदलाब किन मूल्यों पर आधारित हैं? आजादी के पहले समाज ने दुसरो की गुलामी को नकारते हुये उन्हौंने समाज की स्वतंत्रता के लिए एक साथ एक मंच पर अपनी जिन्दगी की कुर्वानी देकर हमें सिखाया की जब तक समाज का हर वर्ग संतुष्ट नही होगा परिवर्तन का दौर चलता रहेगा। पर क्या आज ये कल्पना की जा सकती है की होने वाला परिवर्तन समाज के हर वर्ग या व्यक्ति के लिए हितकर होगा। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और महात्मा ग़ांधी जैसे देशभक्तों ने क्या ऐसे ही भारत का सपना देखा था। जहां देश की आधी आबादी को दो जून की रोटी तक नसीब नही होगी। कर्ज के तले दबे किसानों को आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना होगा और हमारे हुक्मरान उनकी जमीनो को छीनकर उन्हें विकास की परिभाषा बताएंगे। सांप्रदायिकता की बढ़ती आग, भ्रष्टाचार की बढ़ती लौ और शहीदों की चिताओं  से उठता धुआँ आखिरकार क्या यही उन्नत समाज की कल्पना की थी। पृथ्वी से चाँद और मंगल की दुरी तो हमने नाप ली पर गरीब की थाली तक हम नही पहुंच पायें। आखिर क्या कारण है इन सबका जो हमें पूछने को मजबूर करती है कि कैसा विकास किसकी तरक्की। देश की कुल सम्पति का 90 प्रतिशत हिस्सा, 10 प्रतिशत आबादी के हाथों में हैं।
एक तरफ वो आबादी हैं जो मूलभूत जीवन की सुविधाओं- घर,  भूख, बीमारी और अज्ञानता से स्वतंत्रता  चाहते हैं। एक तरफ ये आबादी है जिसके पास फाइफ स्टार सुविधायुक्त वहुमंजिला आलीशान बगलें से लेकर मार्स्टीज और बी. एम. डब्लू कारें हैं। कुछ के पास तो स्वयं के उठनखटोले भी हैं। उच्च तकनीकीयुक्त अस्पताल हैं। इन सब के बावजूद इन महत्वाकांक्षी लोगों में अश्लील किस्म का लालच हैं। वे हर चीज  को हासिल करना चाहते हैं।  वो भी जिसके वो हक़दार नही हैं। समाज के हिस्से के संसाधनों पर इनकी गिद्ध नजर बनी रहती हैं। उन पर कब्ज़ा और  लूट करने में भी ये नही हिचकिचातें। इस नवउपनिवेश के दौर में आम आदमी केवल छदम स्वतंत्रता में जी रहा हैं। इन सब के बीच महात्मा ग़ांधी का हरेक बच्चे की आँखों से आंसू पोंछने का सपना   क्या सपना ही रह जाएगा? इस सपनें को पूरा करने का उत्तरदायित्व हम सब हैं। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए हर मेहनतकश, निष्कपट और ईमानदार नागरिकों को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। इस लक्ष्य को पाना ही इन महापुरुषों  के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजली होगी।




                                             

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015

सेक्युलर कि परिभाषा

हमारे देश के वैचारिक और बुद्धजीवी  वर्ग खासकर वो वर्ग जो अपने स्वयं को मानवतावादी और सेक्युलर कहलाना पसंद करते हैं। तथाकथित ये सेक्युलरवादी केवल मुस्लिम हितों को ही सेक्युलरिज्म मानते हैं। फिर चाहें वो भारत के हो या अन्य किसी देश कें।  इनकी एक और प्रवृति है की मुसलमानों के साथ बुरा किसी भी मुल्क में हो इनका विरोध येन केन प्रकरेण संघ और बीजेपी को दोष दिए बिना पूरा नही होता। इनके मानवतावाद में केबल मुस्लिम हित ही शामिल है। आपत्ति मुसलमानों की लिए आवाज उठाने  से नही बल्कि केवल मुस्लिम को ही क्यों मानवता और सेक्युलर के दायरे आते हैं। विश्व में अन्य धर्मों की हालत भी निराशाजनक हैं। पादरी और यहुदी समुदाय की जनसंख्या लगातार घटती जा रही हैं। पादरी समुदाय की जनसंख्या 60 हजार है जो बीते सालों से लगातार कम होती जा रही है. यहूदीयों की जनसँख्या केवल 5 हजार हैं। पाकिस्तान और बंगलादेश में आज हिन्दुओं की क्या दुर्दशा है उसकी और भी ध्यान दिया जाना चाहिए या नही। पाकिस्तान में हुई 1951 की जनगणना में हिन्दु और सिखों की जनसंख्या का प्रतिशत कुल जनसख्या का 4 प्रतिशत था। लेकिन 1991 में हुए जनगणना में इनका प्रतिशत 1 कैसे रह गया। बाकि 3 प्रतिशत लोग कहा चले गये। हिन्दु मंदिरों को तोड़ा जा रहा हैं। उन्हें अपने धार्मिक रीती रिवाजों को करने से रोका जाता हैं। क्या हमारे सेक्युलर भाई इनके लिए भी चिंता  जाहिर करेंगे।
           गाजा में हो रहे इजराइल हमले की निंदा हर कोई कर रहा हैं। पर एक प्रसिद्ध हिंदी अखबार के लिखा जाता है कि इस हमले में ज्यादा खुसी संघ और बीजेपी को हो रही हैं। लेखक के अनुसार "दुनिया में जहां कही भी मुसलमानों को नुकसान पहुंचे ,आरएसएस भले ही मिठाइयां न बाटे, पर इनके नेताओं के चहरे खिल जाते हैं।"और आगे लिखते है कि "इसी वजह से केंद्र सरकार ने गाजा पर कोई प्रस्ताव लाने से इंकार कर दिया। ऐसा कभी नही हुआ कि भाजपा या उसके किसी संगठन ने इजराइल दूतावास पर हुए विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया हो।" इस तर्क से ये सिद्ध होता है कि सेक्युलर की नीति चीखने और चिल्लाने की रही हैं। वो ये भूल जाते है कि इजराइल के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र संघ में द्वारा मानवाधिकार उलंघन प्रस्ताव के पक्ष में भारत ने वोट भाजपा की सरकार ने ही दिया था। जो दर्शाता है कि वो इन हमलों की भर्त्सना करते हैं। लेकिन जिन्हें केवल किसी भी प्रकार से जो गंगा, गाय, गीता और हिंदु की रक्षा की बात करें या उनसे जुड़े मुद्दों को उठायें वह इनकी नजर में न केवल मुस्लिमविरोधी बल्कि साम्प्रदायिक हैं। इनका वश चले तो यह जम्मू कश्मीर में आई बाढ़ के पीछे भी भाजपा और संघ का नाम लेने लगें। पर अफ़सोस की ये कहना उनके वश में नही।

बुधवार, 15 अप्रैल 2015

तर्क की तराजू

भगवान बुद्ध ने कहा था कि किसी बात पर इसलिए विश्वास मत करो कि वह मेरे  गुरु ने  या ग्रंथ  ऐसा कहते हैं। हर शब्द को तर्कों पर तोलो और अपनी बुद्धिमता से सही और गलत का निर्णय करो। पर अक्सर इन ज्ञानपुरुषों के दिए दिव्यज्ञान को छोड़कर हम उनकी प्रतिमाओं के आगे नतमस्तक हो जाते हैं।  अपने हितों को सर्वोपति रखकर उनके नाम पर दूसरों  को उपदेश देते रहते हैं। हम भारतीयों की सबसे बड़ी समस्या ही यही है कि  हम तर्कों के स्थान पर भावनात्मक हो जाते है और भावनात्मक होने के स्थान पर तर्कवादी, और आपसी सौहार्द भुलाकर विभिन्न विचारधाराओं के नाम पर आपस में कटुता और वैमनस्य की भावना को जन्म देते हैं। ये जानते हुए भी की हर विचारधाराओं  का चाहे वो दक्षिणपंथी हो वामपंथी हो , या कोई धर्म सब ने मानव समुदाय के हितों  को ही सर्वोपरि रखा।  ये भी सही है की हर विचारधारा में कुछ खामिया होती है जो उस वक्त की स्थिति परिस्थतियों पर  निर्भर करती हैं। मौजूदा व्यवस्था का प्रभाव उन पर रहता हैं। लेकिन हम उनको तथ्यों और तर्कों की कसौटी पर कसने की वजाह उनका अंधानुकरण करने लगते है तो वो न तो मानवहित मे होता है न समाज हित में।

सोमवार, 13 अप्रैल 2015

वैचारिक उग्रवाद का दौर

वैचारिक उग्रवाद  के दौर से गुजर रहे  इस मुल्क को  अपनी सांस्कृतिक सामरिक पहचान बनाये रखने के लिए समाज के वुद्धिजीविओं और समाजशास्त्रीओं  को ही आगे आना होगा। शासन का काम नियम ,कानून और सुरक्षा व्यवस्था कायम  करना होता है। समाज उचित दिशा और दशा तय करे इसके लिए आजकी पीढ़ी को उचित मार्गदर्शन की नितांत आवयश्कता है। लोकनीति, नैतिकता ,लोक व्यवहार, पारिवारिक और सामाजिक नियमों को अपनी स्वतंत्रता में खनन मानती ये पीढ़ी और अपनी निरंतर बढ़ती भोगवादी इच्छाओ को प्राप्त करना, सभ्यता और संस्कृति को गाली देना, अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करने देना इनकी आज़ादी की पहली शर्त है, यदि इसमे किसी खनन डाला तो वो इनके अधिकारों का हनन हैं। इन विचारों से प्रभावित होने पर अनुशासन, जबाबदेही, देशप्रेम और आत्मिक उन्नति जैसी अवधारणो को समझने मे असमर्थ होती युवा आबादी का बड़ा हिस्सा जिस के बल पर हम दुनिया के सामने सीना तान रहे है, अगर इन्हें सही मार्गदर्शन नही मिला तो भविष्य में इसके परिणाम घातक हो सकते है। धार्मिक उग्रवाद हो या वैचारिक उग्रवाद दोनों ही समाज के लिए पतन का कारण होते हैं।  इसलिए विरोधी स्वर को सुधारात्मक स्वर में बदले बिना देश  मुख्य समस्याओं जैसे गरीबी, सामाजिक विघटन, साम्प्रदायिकता जैसी विकराल समस्याओं का समाधान नही कर  पायेगे। मैजूदा हालातो में बढ़ती युबा आवादी को प्रतिभावान और वैचारिक सशक्तिकरण करना अतिआवश्यक हैं। स्वामी विवेकानंद ने कहा था "हम बालू पर राष्ट्र निर्माण नही कर सकते, उसके लिए एक ठोस आधार एक चट्टानी नीव चाहिए और वह केवल चरित्र निर्माण के द्वारा ही हासिल किया जा सकता हैं।"