भगवान बुद्ध ने कहा था कि किसी बात पर इसलिए विश्वास मत करो कि वह मेरे गुरु ने या ग्रंथ ऐसा कहते हैं। हर शब्द को तर्कों पर तोलो और अपनी बुद्धिमता से सही और गलत का निर्णय करो। पर अक्सर इन ज्ञानपुरुषों के दिए दिव्यज्ञान को छोड़कर हम उनकी प्रतिमाओं के आगे नतमस्तक हो जाते हैं। अपने हितों को सर्वोपति रखकर उनके नाम पर दूसरों को उपदेश देते रहते हैं। हम भारतीयों की सबसे बड़ी समस्या ही यही है कि हम तर्कों के स्थान पर भावनात्मक हो जाते है और भावनात्मक होने के स्थान पर तर्कवादी, और आपसी सौहार्द भुलाकर विभिन्न विचारधाराओं के नाम पर आपस में कटुता और वैमनस्य की भावना को जन्म देते हैं। ये जानते हुए भी की हर विचारधाराओं का चाहे वो दक्षिणपंथी हो वामपंथी हो , या कोई धर्म सब ने मानव समुदाय के हितों को ही सर्वोपरि रखा। ये भी सही है की हर विचारधारा में कुछ खामिया होती है जो उस वक्त की स्थिति परिस्थतियों पर निर्भर करती हैं। मौजूदा व्यवस्था का प्रभाव उन पर रहता हैं। लेकिन हम उनको तथ्यों और तर्कों की कसौटी पर कसने की वजाह उनका अंधानुकरण करने लगते है तो वो न तो मानवहित मे होता है न समाज हित में।
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