बुधवार, 17 दिसंबर 2014

मनमोहन कान्हा विनती करू दिन रैन

मनमोहन कान्हा विनती करू दिन रैन
मनमोहन कान्हा बिनती करू दिन रैन
रहा टेक मेरे नैन
राह टेक मेरे नैन
अंब तो तरस दे दो कुंजबिहारी
मनवा है बेचेन
मन मोहन कान्हा
विनती करू दिन रैन
स्नेह की डोरी तुम संग जोड़ी
हम से तो नाही जाए ये तोडी
हे मुरलीधर कृष्ण मुरारी (२)
तनिक ना आवे चैन
रह टेक मेरे नैन (२)
अब तो तरस दे दो कुंजबिहारी
मनवा है बेचेन
मन मोहन कान्हा
विनती करू दिन रैन

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

अब हालात की एक तस्वीर भर हो तुम

सोलह दिसम्बर की रात  हो या कोई और रातें , जिनमे हैवानियत के हाथो इंसानियत का शिकार हुआ।  उन रातों का अंत न हो पाया और न मौजूदा हालातो को मद्देनजर रखते हुए हो पाने की उम्मीद की जा सकती है। एक के बाद एक  इसानियत को झकझोर करने वाले वाकया सामने आते रहते है। अभी कुछ ही दिनों बाद निर्भया की दुसरी बरषी है । उसके कुछ ही दिनों पहले दिल्ली की सड़को पर फिर इंसानियत शर्मसार हुई फिर कानून से लेकर राजनीति करने वालो को कटखरे मे खड़ा किया गया,पर उस समाज का क्या जिसमे  संवेदनाओं अंत हो रहा  हैं।
  कानूनो मे सुधार हुआ वक्त आने पर सरकारे बदली पर सड़को से उठने वाली चीखे शांत नही हुई चीखे घुटकर रह गई उम्मीद वाकी रही क्यों की उम्मीद ही तो है जो साथ है बाकी  तो साथ छोड़ ही देते हैं।      
एक प्रशन मेरे चेतन मे स्वत: ही हिलोरे मरता है कि आखिर क्या वजह है। जिस स्त्री को भारतीय ग्रंथों और शास्त्रों मे दुर्गा ,काली और शक्ति की उपमा देकर पूजनीय बताया गया ,जिसे प्रकृति  का स्वरूप कहा वही स्त्रीं आज लाचार ,बेसहारा अकेली खड़ी है? आखिर क्या वजह है की  देश की बड़ी आवादी आखिर क्यों शोषित और प्रताड़ित हो रही है।  इसका  उत्तर समाजशास्त्री और धर्मशास्त्री अपने तर्कशास्त्र से जवाव दे देंगे,लेकिन इन कुकृत्यों का चक्रव्युह जो  चारो और फैला है उसका अंत कब और कैसे होगा । 
 किसी ने  ठीक ही लिखा है……                           
                                           अब हालात की एक तस्वीर भर हो तुम
                                            हादसा तो बस सामने ले आया है इसे
                                              तेरी सूरत से झांकता है ये मुल्क
                                            जिसे ऐसा ही बनाया है बनाने  बालो ने
         

रविवार, 14 दिसंबर 2014

कॉर्पोरेट का राजनीति में बड़ता दखल

कॉर्पोरेट का राजनीति में बड़ता दखल और पार्टियो पर लगते आरोपों से सिद्ध हो गया  की चुनावी मैदान में केवल राजनैतिक दल ही नही कॉर्पोरेट भी है। करोड़ो से अरवों में पहुचता चुनावी खर्च दर्शाता है।  कि कॉर्पोरेट जगत ही पार्टियो को फड़ के नाम पर चुनावी खर्च का वाहन करता हैं और चुनाव के बाद उन पर मेहरवान होकर प्राकृतिक संशाधनों का अंधाधुन्द दोहन कराकर मुनाफा पहुचाते हैं। स्पेक्ट्रम, कोयला और गैस जैसे अरवो खरबों के घोटाले हुए। कोंग्रेस बजेपी पर आरोप लगती है की पैतलिश हज़ार एकड़ की जमीन नैनो कर सयंत्र लगाने के लिए अदाणी को एक रूपए गज मे गरीबो दी, तो जबाब मे बीजेपी सुब्रमण्यम नेता स्वामी  कोंग्रेस पर सोनिया के दामाद रॉवर्ट वाड्रा पर जमीन को करोडो मे बेचने का आरोप लगाया।इन सब मे  एक तथ्य सत्य है की दोनों ही पार्टिया कॉर्पोरेट की कठपुतलियाँ है।  जब आम आदमी पार्टी ने तेलमंत्री वीरप्पा मोहली और रिलायंस ग्रुप के मालिक मुकेश अम्बानी पर गैस की धांधली का आरोप लगाए और एफआईआर की जो जिस तरह से  राजनीतिक दल बचाव मे आ गये जिस कोयला घोटाले पर इतने सालो से भाजपा और कोंग्रेस चुप्पी सादे बैठे हुए थे जब केजरीवाल ने आवाज़ उठाई तो पुरे देश मे हंगमा मच गया इसी प्रकार जब सीबीआई ने मंगलम् बिड़ला को दोषी मान खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर जाँच की बात की तो केंद्र सरकार ,बीजेपी  और उघोग जगत बिड़ला के बचाव मे आ गया। जिस तरह से कॉर्पोरेट और राजनीति का चोली दामन का साथ हैं वो देश की आर्थिक सेहत और विकाश के लिए हानिकारक है।