सोमवार, 15 दिसंबर 2014

अब हालात की एक तस्वीर भर हो तुम

सोलह दिसम्बर की रात  हो या कोई और रातें , जिनमे हैवानियत के हाथो इंसानियत का शिकार हुआ।  उन रातों का अंत न हो पाया और न मौजूदा हालातो को मद्देनजर रखते हुए हो पाने की उम्मीद की जा सकती है। एक के बाद एक  इसानियत को झकझोर करने वाले वाकया सामने आते रहते है। अभी कुछ ही दिनों बाद निर्भया की दुसरी बरषी है । उसके कुछ ही दिनों पहले दिल्ली की सड़को पर फिर इंसानियत शर्मसार हुई फिर कानून से लेकर राजनीति करने वालो को कटखरे मे खड़ा किया गया,पर उस समाज का क्या जिसमे  संवेदनाओं अंत हो रहा  हैं।
  कानूनो मे सुधार हुआ वक्त आने पर सरकारे बदली पर सड़को से उठने वाली चीखे शांत नही हुई चीखे घुटकर रह गई उम्मीद वाकी रही क्यों की उम्मीद ही तो है जो साथ है बाकी  तो साथ छोड़ ही देते हैं।      
एक प्रशन मेरे चेतन मे स्वत: ही हिलोरे मरता है कि आखिर क्या वजह है। जिस स्त्री को भारतीय ग्रंथों और शास्त्रों मे दुर्गा ,काली और शक्ति की उपमा देकर पूजनीय बताया गया ,जिसे प्रकृति  का स्वरूप कहा वही स्त्रीं आज लाचार ,बेसहारा अकेली खड़ी है? आखिर क्या वजह है की  देश की बड़ी आवादी आखिर क्यों शोषित और प्रताड़ित हो रही है।  इसका  उत्तर समाजशास्त्री और धर्मशास्त्री अपने तर्कशास्त्र से जवाव दे देंगे,लेकिन इन कुकृत्यों का चक्रव्युह जो  चारो और फैला है उसका अंत कब और कैसे होगा । 
 किसी ने  ठीक ही लिखा है……                           
                                           अब हालात की एक तस्वीर भर हो तुम
                                            हादसा तो बस सामने ले आया है इसे
                                              तेरी सूरत से झांकता है ये मुल्क
                                            जिसे ऐसा ही बनाया है बनाने  बालो ने
         

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