किसी देश के अर्थिक
विकास की गति को बढ़ाने में उस देश की जनसंख्या की भुमिका महत्वपूर्ण होती है। जिस
देश की जनता शिक्षित, प्रशिक्षित तथा तकनीकी ज्ञान से युक्त होगी वह देश उतनी ही
तेजी से विकास करेगा। चीन भारत से इसी दम पर आगे है। 1980 में चीन की साक्षरता दर जंहा
64 फीसद थी वह अब 95.5 प्रतिशत है। वहीं भारत की साक्षरता 74 फीसद। चीन कुल सकल
घरेलू उत्पाद का शिक्षा पर व्यय चार फीसदी है और स्वास्थ पर तीन प्रतिशत व्यय करता
है। भारत सरल घरेलू उत्पादन का शिक्षा पर व्यय चार फीसदी और स्वास्थ पर एक फीसदी
खर्च करता है। चीन ने 1981 से 2013 तक 68 करोड़ की गरीब जनता को उच्च आय की श्रेणी
में ला दिया। उसने अपनी जनता को रोजगारपरक बनाकर अपनी मानवपूंजी का उपभोग बड़ी
मात्रा में किया। आज वह
भारत की जीडीपी से पांच गुना ज्यादा है। यानी जंहा भारत का सकल घरेलू उत्पादन 2
ट्रिलियन है वही चीन का 9 ट्रिलियन ड़ॉलर है। चीन आज आर्थिक संवृद्धि तथा विकास
में भारत से कई आगे निकल चुका है। ये सब चीन ने अपनी मानवपूंजी को सशक्त कर हासिल
किया हैं। भारत जो युवाओं का देश है जिसकी 65 फिसदी आवादी नौजवान हो वह कैसे अपनी
आर्थिक व सामाजिक स्थितियों में बदलाव लाने में असमर्थ है? इसका
सबसे बड़ा कारण है घटिया किस्म की मानवपूंजी। विश्व आर्थिक फॉरम की 2015 में
जारी रिपोर्ट जो देशों की मानवपूंजी उपभोग पर आधारित है में भारत का 124 मुल्कों
में 100वां स्थान हैं। दिलचस्प तो यह है कि भारत अपने पड़ोसी मुल्क बग्लादेश, श्रीलंका
और भूटान से भी पीछे हैं। ब्रिक्स देश (रुस, चीन, ब्रजील और दक्षिण अफ्रीका) भारत
से आगे हैं। जिसका अर्थ है भारत अपनी मानवपूंजी का इस्तेमाल करने में पीछे हैं।
जिसका कारण है भारत आपनी जनता को शिक्षित,
कौशल विकास और स्वास्थ जैसी जनकल्याणकारी योजनाओं पर नाम मात्र का व्यय करता हैं। ग्यारवही
पंचवर्षिय योजना में शिक्षा और स्वास्थ पर कुल परियोजना व्यय का 10.9 प्रतिशत किया
गया। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि विकासशील देशों को अपने मानव संसाधनों पर 30
से 35 प्रतिशत निवेश करना चाहिए। विकसित राष्ट्रों में यह व्यय पर्याप्त मात्रा
में किया जाता है जिसका लाभ उन्हें मिलता हैं। यही कारण है कि कौशल निर्माण का
स्तर विकसित देशों का अपेक्षाकृत ऊंचा है। भारत जो विश्व की सातवीं बड़ी जीडीपी और
तीसरा क्रयशक्ति वाला मुल्क है उसे आपनी मानव पूंजी को सशक्त करने की तरफ पर्याप्त
ध्यान देना होगा तभी देश की आवाम गरीबी, भुखमरी, कुपोषण और बेरोजगारी से मुक्त हो
पाएगा।
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